रविवार, 12 जुलाई 2026

चोर की दाढ़ी में तिनका [ गीतिका ]

 229/2026


    


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चोर   की  दाढ़ी में तिनका  हिल रहा है।

झोपड़ी  में  फूल स्वर्णिम  खिल रहा है।।


दान को   दाता   बिना   अपना  बनाया,

मूषकों    का क्या तुम्हारा बिल रहा है ?


चार दिन की    चाँदनी   अब ढल गई है,

इसलिए तो    अब    अँधेरा मिल रहा है।


राम   के   दरबार     का    तू   चोर  बंदे,

सींखचों के  मध्य  मर  तिल-तिल रहा है।


रामजी    की आँख   में    तू    धूल झोंके,

भामिनी अपनी   सजा क्या  सिल रहा है।


कार    बँगलों  प्लॉट  में     हैं   हाथ   काले,

क्या कभी   काला   न   तेरा   दिल रहा है?


यदि 'शुभम्'  तू  सोचता   परलोक  की भी,

सोचदानी    से    सदा  तू    निल   रहा  है।



शुभमस्तु,


05.07.2026◆3.00प०मा०

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