227/2026
©डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
जब से राम अयोध्या आए।
भक्त जनों ने मोद मनाए।।
भाग खुल गए झोपड़ियों के ,
चोर लुटेरे भी सिर नाए।
नहीं स्वप्न में सोचा ऐसा,
सोना बने लौह निर्माए।
दानपात्र का पारस पाकर,
परस किया सोना बन पाए।
मुख में राम तिलक मस्तक पर,
चोरी करें चोर के जाए।
लोहे की अब खुलीं सलाखें,
ग्रीवा झुकी नयन शरमाए।
'शुभम्' गर्म हो गई सियासत,
नेता खड़े -खड़े डर खाए।
शुभमस्तु,
05.07.2026◆1.00 प०मा०
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