230/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
हुई राम-मंदिर में चोरी।
चोर ढूँढ़ते सँकरी मोरी।।
बचा नहीं पानी आँखों में,
शक्ल बनाते अपनी भोरी।
गगन चूमते महल - दुमहले,
नित्य बदलतीं साड़ी कोरी।
सोने चाँदी के आभूषण,
देह धारतीं वामा गोरी।
मिली ढोल में पोल सुरीली,
चढ़ा रहे आँखों की त्योरी।
अवसर ताक रहे कुछ नेता,
लाभ मिले छल चोर ठगोरी।
'शुभम्' विकट यह अजब कहानी,
उठी जेठ में चोरी- होरी।
शुभमस्तु,
05.07.2026◆5.15 प० मा०
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