224/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
देना सबको भावता, भाँति-भाँति उपदेश।
व्यासासन पर बैठता ,बढ़ा शीश के केश।।
बढ़ा शीश के केश, श्वेत पीतांबरधारी।
बाँट रहा है ज्ञान, समझता कृष्ण मुरारी।।
'शुभम्' दक्षिणा रूप,दान में धन ले लेना।
बनती धजा अनूप,नहीं कुछ और न देना।।
-2-
दाता हैं उपदेश के, पंडित साधु अनेक।
नियम नहीं वे पालते,और न रखें विवेक।।
और न रखें विवेक, आचरण से अविचारी।
मुख में रखते राम, बगल में किंतु कटारी।।
'शुभम्' कभी उद्धार,नहीं उनका हो पाता।
देते पर उपदेश, बने अति ज्ञानी दाता।।
-3-
पहले खुद करते नहीं, पर देते उपदेश।
रँगे गेरुआ वसन वे, बदल रहे नित वेश।।
बदल रहे नित वेश, चलें परदे में उलटे।
हैं विलोम आचार, चरित में पूरे कुलटे।।
मन से 'शुभम्' मलीन, मार नहले पर दहले।
परहित के नासूर, लूटते धन को पहले।।
-4-
जनता तो बस भेड़ है,अपना नहीं विवेक।
भेड़ गिरे जब कूप में,तब होता अतिरेक।।
तब होता अतिरेक, सुनें उपदेश सुरीले।
ठग विद्या के खेल,खेलते चोर हठीले।।
'शुभम्' न सोचे साँच, झूठ ही मानव तनता।
बाँट रहे हैं ज्ञान, लुभा कर अनपढ़ जनता।।
-5-
मिलती रोटी चूपड़ी, मिले बहुत ही स्वाद।
बिना किए की रोकड़ी, बनें मूढ़ आबाद।।
बनें मूढ़ आबाद, बढ़े उपदेशक ज्ञानी।
देते नित उपदेश, तने ऊँचे अभिमानी।।
'शुभम्' अयोध्या धाम,चौर्य की कलियाँ खिलती।
बढ़ते डाकू चोर, धर्म की शाख न मिलती।।
शुभमस्तु,
02.07.2026◆11.15 प०मा०
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