228/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
लगता है मर जाए रावण।
अब न सिया भरमाए रावण।।
अपने को भगवान समझता,
उठा नहीं मुख पाए रावण।
अहंकार का किला बनाकर,
गाज उसी पर ढाए रावण।
नहीं देखता कोई उसको,
लौट-लौट बल खाए रावण।
बंद जुबाँ लटकी है गर्दन,
जग को दोष लगाए रावण।
जो न जानते थे जाने सब,
बहुत-बहुत पछताए रावण।
'शुभम्' कर्मघट फूट पड़ा तो,
पानी सड़क बहाए रावण।
शुभमस्तु,
05.07.2026◆ 1.45 प०मा०
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