रविवार, 12 जुलाई 2026

धरा धन्य प्रभु राम की [ दोहा ]

 223/2026


 

            [धरा,धान,धन,धन्य,धनु]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                  सब में एक

वज्रपात    ऐसा    हुआ, धरा  धँसी पाताल।

अमल अयोध्या धाम में,हुआ चौर्य विकराल।।

आज धरा  पर पाप  का,विकट बढ़ा है भार।

राम-रतन  चोरी  हुआ,गणकों  का अतिचार।।


आया फिर आषाढ़ का,सजल रसीला मास।

धान बुवाई   कर   रहे,कृषक लगाए आस।।

धान रोपतीं   नारियाँ,  बालक वृद्ध अनेक।

हलचल   खेतों  में  बढ़ी,  टर्राते   नर भेक।।


नैतिकता के नाश का, आज काल विकराल।

बिना कमाए चोरते, धन को  बिना धमाल।।

दुनिया  में धन के  बिना,  एक न पूछे बात।

श्वेत श्याम जैसा मिले,यद्यपि जात- कुजात।।


धन्य-धन्य   कैसे   कहें, बने  दान  के चोर।

देख  दृश्य ये पाप  का,काँप उठा नभ छोर।।

भक्त धन्य  हैं  राम  के, करते  सोना  दान।

करते  हैं  क्या कर्म   वे, हमें  नहीं अनुमान।।


धारण कर धनु राम ने,किया असुर संहार।

प्राण  गए  मारीच  के,  गूँज  उठी टंकार।।

राशि चक्र में राशि है,नवमी धनु  का रूप।

मेष वृषादिक अन्य का,अलग एक है यूप।।


                 एक में सब

धरा धन्य प्रभु राम की,लिए  कंध धनु एक।

लहराते   हैं धान के,खेत    धरे  धन   नेक।।


शुभमस्तु,


01.07.2026◆7.15 आ०मा०

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