382/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
आठ पहर
चौंसठ घड़ियाँ ही
सबको मिलीं बराबर।
कहता कोई
समय नहीं है
करूँ काम मैं कैसे
रहे न कमतर
समय काम को
बढ़ूँ राह में ऐसे
सोलह पहर
समय के होते
करता प्राण निछावर।
हो मजदूर
बड़ा अधिकारी
मंत्री या कि विधायक
खेत जोतता
हो किसान भी
गृहणी घर के लायक
सबको मिले
समय सम क्षमता
अकबर राणा बाबर।
कितना सोया
खाया खोया
कितना काम किया है
कोई जिए
पेट की खातिर
नित मधुपान लिया है
बतलाता परिणाम
जगत को
कितना किसमें पावर।
सभी सोचते
भला स्वयं का
मुल्ला ईश पुजारी
पेट काटते
मानवता का
धन की भर- भर लारी
नेता चोर
डकैत लुटेरे
सब जाते पूजाघर।
होड़ लगी है
सबसे आगे
निकल दौड़ मैं जाऊँ
आठ पहर
चौंसठ घड़ियों में
सबसे ऊपर पाऊँ
नाद अनाहत
बजा रहा है
कालदंड घण्टाघर।
शुभमस्तु,
31.10.2026◆3.30 प०मा०
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