386/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
वन खिले
काँस के फूल
शरद ऋतु आई।
अस्ताचल जाता
भानु
छटा बिखराए
स्वर्णिम आभा
भंडार
धरा पर लाए
बुढ़ा गई
ऋतु
पावस देखो भाई।
चलती है
पछुआ हवा
मूँज बल खाए
जब उठे
झकोरा
तेज खूब लहराए
है सुखद
सुहानी
छटा बड़ी मनभाई।
अंबर है नीला
अभी
परी -सी उतरी
संध्या रानी
धरती पर
सुथरी निखरी
नीड़ों में
लौटे कीर
पखेरू धाई।
शुभमस्तु,
03.11.2026◆ 4.15 आ० मा०
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