शनिवार, 16 मई 2026

माँ [गीतिका]

 157/2026


               


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


श्रम   से   नहीं     उबरती  माँ।

हर पल    उद्यम     करती  माँ।।


निज   संतति   की   ईश्वर   जो,

नहीं  किसी     से   डरती   माँ।


पुत्री-पुत्र         प्रसविनी       है,

उदर -  कुक्षि     में   धरती   माँ।


माँ  ममता       की     सुरसरिता,

पाप- ताप    सब    हरती     माँ।


आँचल  माँ  का    वट  की छाँव,

दुःख - दारिद   को   छरती   माँ।


उसे   न   कुछ   भी    दुर्लभ   है,

धन -धान्यों    से    भरती     माँ।


'शुभम्'  उऋण  होगा  न   कभी,

उर    में    सदा    विचरती    माँ।


शुभमस्तु,


10.05.2026◆12.45 प०मा०

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