शनिवार, 16 मई 2026

लाज करें सब जेठ की [ दोहा ]

 154/2026



        [ जेठ,गर्मी,भीषण,पारा ,लू ]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'

    

              सब में एक

लाज करें सब जेठ की,चलें राह कच खोल।

अवगुंठित हैं  नारियाँ, बढ़ती  तपन अतोल।।

लुएँ  चलें  जब  जेठ में,टपक  रहें  हैं आम।

अमराई  आबाद   है,  ग्रीष्म  हुआ  बदनाम।।


शीतकाल  मधुमास   के,  चार   मास उपरांत।

तपती  गर्मी  आ  गई, जीव   जगत आक्रांत।।

फालसेव   तरबूज   की, ऋतु गर्मी  की व्यग्र।

महक  रहे  खरबूज   भी,  चहके  आम समग्र।।


ताप   बढ़ा  जब भानु का, भीषण धूप प्रकोप।

ताल-तलैया      सूखते,   धरणी    पर आरोप।।

भीषण भय  भवितव्यता,जान सका है  कौन।

निज  कर्मों  में   लीन  हैं,जीभ  सभी  की मौन।।


ज्यों-ज्यों  चढ़ता  ताप है,  पारा चढ़े  अपार।

जेठ मास  की  उग्रता,  किंचित  नहीं   उदार।।

उचित   नहीं  पारा  चढ़े, ऊपर- ऊपर नित्य।

स्वस्थ  नहीं  मानव रहे,  अस्वीकृत औचित्य।।


बालक घर  रुकते नहीं, लू  का बढ़ा प्रकोप।

गलियों में  दौड़ें  सभी,झुलस गई मुख ओप।।

पना  आम  का  पीजिए,लू का यह उपचार।

कपड़ा बाँधें शीश पर,तन का ताप निवार।।


             एक में सब

गर्मी भीषण जेठ की,लू का अति संचार।

दिन प्रति दिन पारा चढ़े,एक नहीं उपचार।।


शुभमस्तु,


06.05.2026◆12.15प०मा०

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