शनिवार, 16 मई 2026

मन में स्रोत अकूत [ कुंडलिया ]

 155/2026


        

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

खिलता-मुंदता   आदमी,मुख -दर्पण में रूप।

दिखता है पल  एक  में, यद्यपि  हो नर भूप।।

यद्यपि  हो  नर  भूप,  खिलाए   या मुरझाए।

मन का ही यह काम,हर्ष की कली खिलाए।।

'शुभम्' न  होता  दृष्ट,दृष्टि में हर पल मिलता।

तन के   हर्ष-विषाद, सभी  में मन ही खिलता।।


                         -2-

करता  मन   मनमानियाँ,  गहे  हाथ  में रास।

इच्छा से उसकी  चले,  जीव- जंतु की श्वास।।

जीव-जंतु की  श्वास, अटल साम्राज्य बसाया।

चले न मुख में ग्रास,जदपि   तन  भूखा पाया।।

'शुभम्' अश्व की रास,थाम निज पंथ विचरता।

मन के ही  नर  दास,वही  सब  करनी करता।।


                         -3-

लगती लौ जिस काम में, मन में  लगन   अपार।

गति   में   सबसे  तेज  है, वाहन  भले   हजार।।

वाहन     भले    हजार,  न   उड़ता  इतना कोई।

यद्यपि   बड़े  विमान,   सभी   ने  समता   खोई।।

'शुभम्' सकल जंजाल,त्याग कर प्रभु की भगती।

मन   की  दिशा   संभाल,चेतना  शुभ में  लगती।।


                           -4-

कविता  की  उद्भावना,  मन  से उपजी  पौध।

छाई   है   साहित्य   में,   बने   हुए  बहु सौध।।

बने   हुए     बहु    सौध, ग्रंथ   रामायण भारी।

महाकाव्य  न्यग्रोध ,खिले कवि की उजियारी।।

'शुभम्'   वहाँ पर   दौड़, नहीं जाए जहं सविता।

किसलय कवि के दिव्य,उग रही मन से कविता।।


                          -5-

मानव   के  विज्ञान  का, मन में स्रोत अकूत।

पंच तत्त्व  के  बीच में, उगे   सूक्ष्मतम सूत।।

उगे  सूक्ष्मतम  सूत,चंद्र  की   यात्रा करता।

मन   से    ही   उद्भूत,नहीं  मरने  से डरता।।

'शुभम्' जानता कौन,कभी बन जाए दानव।

मन का ही   सब खेल, मनुजता देती मानव।।


शुभमस्तु,


07.05.2026◆8.30 प०मा०

                    ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...