163/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मुखौटे का पता लगा
मुखौटा उतर जाने के बाद
यथार्थ उजागर हुआ,
होना ही था
अंततः वही हुआ।
अँधेरे की भी
अपनी एक सीमा है
उसे हटना ही पड़ता है
दूध का दूध
पानी का पानी
हो ही जाता है।
कहाँ नहीं हैं बहुरूपिए
छलते हुए इसे उसे
सर्प विष ही उगलता है
उसकी इसी में सफलता है।
शरीर आदमी का है
तो क्या है !
शेर की खाल ओढ़े
भेड़िए अनगिनत यहाँ,
क्या समाज !
क्या धर्म!
क्या राजनीति!
कोई क्षेत्र रिक्त नहीं,
एक ढूंढ़ो हजार
हाज़िर हैं।
गहरी हैं जड़ें
भ्रष्टाचार की
रक्त की हर बूँद में
भरा हुआ है,
कौन है शेष
जिसका मुँह
दूध से धुला हुआ है।
शुभमस्तु,
15.05.2026◆7.00आ०मा०
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