शनिवार, 16 मई 2026

स्वेद श्रमिक का जब-जब बहता [ गीत ]

 153/2026


 

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


स्वेद श्रमिक का

जब -जब बहता

बहे श्रमज सुरसरिता।


ऊँचे-ऊँचे

भवन अटारी

श्रम से निशिदिन बनते

बहे किसी का

स्वेद देह से

सबके सपने सजते

मोल मिले

श्रमिकों को अपना

जीवन हो शुभ चरिता।


श्रमिक 

विश्वकर्मा धरती पर

करते हर निर्माण

करता कौन

बिना श्रमिकों के

मानवता का त्राण

दो रोटी के लिए

खट रहे

बने हुए दुख हरिता।


सृजनों का संसार

इन्हीं के 

हाथों से गढ़ पाया

महलों का सुख

उस निर्धन के

सपनों से नियराया

जब सुगंध

स्वेदों से निकले

रहे न उर में अरिता।


शुभमस्तु,


05.05.2026◆6.00आ०मा०

                  ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...