151/2026
समांत : आल
पदांत : अपदांत
मात्राभार : 24.
मात्रा पतन : शून्य।
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
भानु - ताप बढ़ने लगा,करता जेठ धमाल।
लुएँ चलें तपती हुईं, सर में उठे उबाल।।
छाँव ढूँढ़ती छाँव को, पाँव कहें चल तेज ।
अंबर में जलने लगीं,रवि की तेज मशाल।।
प्यासे-प्यासे गाँव हैं, नगर गली हैं सन्न।
विदा हुआ मधुमास भी,रज का उड़े गुलाल।।
चलती थीं सिर खोलकर,हैं घूँघट के बीच।
वे अधनंगी नारियाँ, चलें दुल्हनी चाल।।
वट पीपल के लाल हैं, पतले-पतले होंठ।
मुरझाए हैं धूप में, बालाओं के गाल।।
खरबूजे को देखकर, खरबूजा भी रंग।
बदल रहा है देख लो, करता हुआ कमाल।।
टपका टपके टप्प से, अमराई के बीच।
बालक उनको बीनते,हिला- हिला कर डाल।।
अमराई के बीच में, कूक रही पिक नित्य।
गौरैया प्यासी फिरे, भरती नहीं उछाल।।
'शुभम्' दशहरी आम को, जेठ मास अनुकूल।
तरबूजे के स्वाद का, शेष न एक जमाल।।
शुभमस्तु,
04.05.2026◆ 6.15 आ०मा०
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