162/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मुँह बाए
प्यासी है धरती
करे मेघ की आस।
तपता सूरज
जेठ मास में
सूख रहे द्रुम-बेल
त्राहि-त्राहि
मच रही धरा पर
जीव रहे सब झेल
घुटन हो रही
चलतीं लूएँ
कठिन श्वास- प्रश्वास।
सघन हरी थी
घास जहाँ पर
वहाँ उड़ रही रेत
भांय-भांय
कर रही तप्त लू
तनिक नहीं है चेत
बहता स्वेद
देह से भारी
नेंक न आए रास।
तप का फल
अषाढ़-सावन में
जब मिलता है मित्र
तृप्त धरा होती
सुख पाती
तब बदले हर चित्र
दिखता है
किसान के घर में
हर दिन नया उजास।
शुभमस्तु,
12.05.2026◆4.30आ०मा०
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