शनिवार, 16 मई 2026

मुँह बाए प्यासी है धरती [ गीत ]

 162/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मुँह बाए 

प्यासी है धरती

करे मेघ की आस।


तपता सूरज

जेठ मास में

सूख रहे द्रुम-बेल

त्राहि-त्राहि 

मच रही धरा पर

जीव रहे सब झेल

घुटन हो रही

चलतीं लूएँ

कठिन श्वास- प्रश्वास।


सघन हरी थी

घास जहाँ पर

वहाँ उड़ रही रेत

भांय-भांय 

कर रही तप्त लू

तनिक नहीं है चेत

बहता स्वेद

देह से भारी

नेंक न आए रास।


तप का फल

अषाढ़-सावन में

जब मिलता है मित्र

तृप्त धरा होती

सुख पाती

तब बदले हर चित्र

दिखता है 

किसान के घर में

हर दिन नया उजास।


शुभमस्तु,


12.05.2026◆4.30आ०मा०

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