मंगलवार, 30 जून 2026

नहीं राम का अब यह घर है [ ग़ज़ल ]

 222/2026

    

 


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


नहीं   राम   का   अब   यह घर है।

नोट  लूटने     का   शुभ   दर   है।।


डाकू-चोर    नोट     नित     गिनते,

लगे  न    जिन   पर   कोई  कर है।


सभी    बताएँ      धाम    अयोध्या,

रहता   इसमें    छलिया    नर    है।


राम   नाम   की   आड़    सजी  है,

यहाँ  लुटेरों   का     ही    डर     है।


तिलक    लगा     पीतांबर    धारी,

रतन   नोट      सोने    का  सर  है।


चचा-भतीजे             जीजा-साले,

इनकी  जेब  नोट     से    तर    है।


कंगाली     में       आटा      गीला,

उनका    देखो  महल    इधर    है।


'ट्रस्ट'  भ्रष्ट  हो    गया    कलंकित,

बिना  सींग  का उजला   खर    है।


मिली भगत     की     गंगा   मैली,

स्वर्ण भवन        संगेमरमर      है।


मन  में  राम     नहीं   अब    रहते,

नोट    गड्डियों      की    चर-चर है।


रक्षक    शुभम्     हुए   जब  भक्षी,

भक्त    काँपता  अब     थर-थर है।


शुभमस्तु,


30.06.2026◆9.15आ०मा०

                  ◆◆◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...