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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप ' शुभम्'
जिस पर जो होता नहीं, रहे उसी की माँग।
फटी जींस में झाँकती, रहतीं दोनों टाँग।।
कपड़ा एक न पास में,मुझे नहीं मालूम।
पहनूँ क्या तुम ही कहो,बनो न बालम सूम।।
भरी हुई अलमारियाँ, फिर भी वस्त्र-अभाव।
औरत को खलता रहे, डगमग घर की नाव।।
हर अवसर की साड़ियाँ, अलग रहें दस- बीस।
शादी सोहर की अलग, महँगी और नफ़ीस।।
यदि साड़ी लाए नहीं, रूठ गई घर- नार।
खटपाटी लेकर पड़ी, बदल गया आचार।।
नव-नव साड़ी में बसे, नित्य नारि की जान।
शांति ग्रहों की चाहिए, लेना तिय पहचान ।।
सक्षम भले न आदमी,फिर भी करे खरीद।
भरी रहें घर साड़ियाँ, जिद में खोए नींद।।
देख पड़ौसिन के यहाँ, नवल साड़ियाँ चार।
घर आई बदला हुआ, प्रियतम से व्यवहार।।
एक पेंट टी-शर्ट में, काट रहा पति साल।
पर पत्नी की साड़ियाँ, बनतीं नई मिसाल।।
हों हज़ार घर साड़ियाँ, फिर भी सदा अभाव।
ले उधार ऋण में दबे, पति की डूबे नाव।।
घर-घर की यह बात है,सत्य 'शुभम्' की खोज।
उसे न पल को चूकना,महके सुमन सरोज।।
शुभमस्तु,
13.09.2026◆4.30 प०मा०
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