गुरुवार, 17 सितंबर 2026

पेट की ये आग [ गीत ]

 289/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


पेट की ये आग

करा लेती है

करतब  कितने-कितने!


देखने वाले

अंगुलियाँ दबा लें 

दाँतों के तले

है नहीं 

कोई घर बार

सब छोड़ चले

बाँध कर नजरें

खड़े हैं

भीड़ में इतने-इतने।


जान की परवाह बिना

पटरे पर चलना

नर्तित होना

सहज नहीं है

ये काम

हँसना -रोना

सोच लेते हैं

ये दर्शकगण

उनके फ़ितने।


आदमी तो आदमी

कम नहीं है

औरत कोई

ज़िंदगी में

कर गुज़रने की

जगी हिम्मत खोई

देह के कमाल

दिखला के

रहते जितने।


शुभमस्तु,


15.09.2026◆3.450 प०मा०

                  ◆●◆

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