गुरुवार, 17 सितंबर 2026

चलता पथ में सँभल-सँभल कर [ गीतिका ]

 288/2026





©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


चलता पथ में सँभल-सँभल कर।

लगता  किंचित नहीं   उसे  डर।।


डूब  गया    है   घट    पानी   में,

क्षण भर  में   वह  जाता है भर।


मेला    लगा    भीड़    है   भारी,

सहस-सहस  मिलते  नारी-नर।


पावस  लगा     भेक   करते  हैं,

दिवस-रात   में   मीठी   टर-टर।


अमराई     में      तेज     हवाएँ,

करती  रहतीं  सर-सर   मर-मर।


रहता  दुखी     सदा   वह  प्राणी,

अन्य जीव   के   रहता     ऊपर।


'शुभम्'  देह    पर  चढ़ा  बुढ़ापा,

अंग-अंग   होता   नित   जर्जर।


शुभमस्तु,


14.09.2026◆6.00आ०मा०

                 ◆●◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...