288/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
चलता पथ में सँभल-सँभल कर।
लगता किंचित नहीं उसे डर।।
डूब गया है घट पानी में,
क्षण भर में वह जाता है भर।
मेला लगा भीड़ है भारी,
सहस-सहस मिलते नारी-नर।
पावस लगा भेक करते हैं,
दिवस-रात में मीठी टर-टर।
अमराई में तेज हवाएँ,
करती रहतीं सर-सर मर-मर।
रहता दुखी सदा वह प्राणी,
अन्य जीव के रहता ऊपर।
'शुभम्' देह पर चढ़ा बुढ़ापा,
अंग-अंग होता नित जर्जर।
शुभमस्तु,
14.09.2026◆6.00आ०मा०
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