सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

ग़ज़ल

✍रचयिता ©   
🍁 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'  
हमने     जाती      बहार   को देखा।
फूल,  कलियों   को खार  को देखा।।

पड़    गए    पीत    नीम  के पल्लव,
ऐसे     पत्तों   की   धार    को देखा।

खिल  गए जब    गुलाब  गालों  के ,
आँख    में    फिर   ख़ुमार  को देखा।

जिसने     पुतले   बनाये   माटी के,
किसने   ऐसे     कुम्हार    को देखा।।

रब    की   कारीगरी    अजब  देखी,
ढार   को    देखा  उभार  को देखा।

जान   के   बिन  ये जिस्म क्या यारो,
रब    के   उस   चमत्कार   को देखा।

कौन कहता है  'शुभम'  रब है नहीं,
उसके   इंसा    से प्यार     को देखा।।

💐 शुभमस्तु !

08.02.2020◆7.15अप.।

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2020

जाती हुई वह! [ लघु - हास्य ]


  ✍लेखक © ☘ डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम' 
            अच्छा तो तुम जा रही हो ?अब कैसे कहें कि जाओ।और कैसे कहें कि मत जाओ। हम कुछ भी तो नहीं कह सकते। क्योंकि न तो तुम हमारे कहने आती हो तो जाओगी भी क्यों? अब तुम्हें जाना है , तो जाना ही है। अपना कोई बस नहीं। कहते हुए अच्छा तो नहीं लग रहा कि जाओ। क्योंकि अगले वर्ष तुम्हें फिर आना है। हर आने वाले को जाना तो होता ही है। किसी का आना जितना सुखद होता है, उसका जाना ,उतना ही दुःख भी देता है। हर अच्छे या बुरे में कुछ अच्छाइयाँ भी होती हैं और कुछ बुराइयाँ भी होती हैं। सच कहें तुम्हारे भीतर भी बहुत- सी अच्छाइयाँ थीं औऱ बुराइयाँ भी थीं। अब तुम जा ही रही हो ,तो बुरी बातों की चर्चा क्यों की जाए , लेकिन यह एक साहित्यिक व्यक्ति की आवश्यक विवशता है कि उसे उभय पक्षों को देखना पड़ता है ,तो उनकी चर्चा करना भी आवश्यक हो जाता है। इसलिए इस नाचीज़ का यह विनम्र अनुरोध है कि तुम बुरा नहीं मानोगी। अब तुम जा तो रही ही हो। विदाई के क्षण बहुत ही भावुक करने वाले होते हैं। तुम्हें भी जाते हुए देखकर हम भावुक हो रहे हैं । पर क्या करें ? बस अब सीधे से इस बात पर आते हैं कि पहले अच्छाई की बात करें या बुराई पर बृहद आख्यान दें। क्योंकि एक सिद्धांत यह भी है कि अंत भला तो सब भला । इसलिए पहले बुराई का वृतांत ही बखान कर लें ,तो उत्तम होगा।

               जब शुरू -शुरू में तुम्हारा आगमन हुआ तो बड़ा सुखद लगा। एक हल्के से चादर में ही तुम्हारे स्पर्श से देह - रक्षा हो जाती थी। धीरे -धीरे दशहरे के बाद तुमने अपने हाथ - पैर फैलाने शुरू कर दिए तो हम कम्बल का सम्बल लेने को उसकी आवश्यकता महसूस करने लगे और कम्बल के नीचे जाकर शरण ले ली । उसके बाद दीवाली के दिये भी जल गए तो जैसे तुम अपने यौवन पर आ गई औऱ उसकी जोर - आजमाइश हमारे ऊपर करने लगीं। गौरैया , कबूतर , फाख्ता जैसे छोटे और भोले पखेरू परेशान होने लगे। उनके घोसलों में कोई गद्दे -रजाई तो नहीं बिछे थे , इसलिए वे बेचारे अपने पंखों में ही सिमटकर रहने को विवश हो गए। कौवे भी पेड़ की डालियों से चोंच खुजलाने लगे। गाय - भैंसे तुमसे परेशान होकर रँभाने - कांपने लगीं। धीरे -धीरे तुम्हारे कोहरे ने खेतों ,सड़कों , गाँव , नगर, नदी , मैदान , आसमान सबको अपने आगोश में ले लिया कि वे परेशान हो गए। गरीब बेचारे क्या करते ? उनके पास इतने पैसे ही कहाँ थे ,जो कि वे तुमसे बचने का कुछ उचित प्रबंन्ध कर पाते ! अमीरों ने तो अपने मोटे -मोटे गद्दे -रजाइयों की शरण ले ली। गर्म भोजन , ग़ज़क , मूंगफली ,गर्म चाय कॉफी, का आनंद उठाने लगे। कुछ तो पिकनिक मनाने और बर्फ से खेल खेलने के लिए पहाड़ी यात्रा पर निकल गए। जब नोटों से तिजोरी गर्म हो तो काहे की सर्दी  -गर्मी ! उन्हें तो बारह मास वसन्त ही है। इसलिए धनाढ्यों को मौसम की सर्दी गर्मी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये बात तो माननी ही पड़ेगी। गरीबों को तो धूप औऱ आग का सहारा ही तुमसे रक्षा कर सकता है। सो वे करते रहे। जो शरीर से कमजोर या बीमार थे , वे बहुत से लोग तो तुम्हारे ही कारण भगवान को प्यारे हो गए।नेताओं, अमीरों, सेठों , अधिकारियों, के लिए इस बात का कोई असर नहीं पड़ता कि कौन सा मौसम है , वे तदनुरूप अपने को बदल पाने में सक्षम जो हैं!

         परन्तु हमसे पूछो कि तुम्हारे आगमन के बाद हमारे ऊपर कैसी बीती। रात में टॉयलेट में घुसना भी ऐसा लगे कि बर्फ के घर में घुस रहे हैं। नहाने की कौन कहे ! मुँह धोना भी एक दुस्साहसिक कठोर कार्य लगे ! पानी पीने के लिए गिलास उठाएं तो हाथ की अंगुलियाँ ही गल -गल जाएँ! जैसे सारा घर फ्रिज ही हो गया हो। हम लोग घर में न रहकर फ्रीजर में बिस्तर लगाए बैठे हों! जमीन पर जूते -चप्पल में भी पैर रख पाना मुश्किल ! गर्म खाने की कोशिश करें तो मिनटों में खाना ठंडा! रात को सोने की कोशिश करें तो लिहाफ से चेहरा तक बाहर निकल पाना मुश्किल! नहाना भी मजबूरी। जितना हो सकें ,पानी से रखते दूरी! पर जरूरी काम तो निपटाने ही पड़ते। वहाँ गर्म पानी ले नहीं जा सकते । हाथ भले धो लीजिए। अब हमारे लिए पत्नी जी कितनी बार पानी गरम करे ! हाथ धोने को अलग , मंजन को अलग, पीने को अलग औऱ नहाने की तो सोचना ही नहीं? गरम से नहाएं तो ठंड ज्यादा लगे , ठंडे से नहाया न जाये। हाए ! हाए !!

           एक बात की चर्चा और । अगर सर्दी में स्वेटर बुनाई की चर्चा नहीं की गई तो सब बेकार। हमारी बहनों , माताओं, भौजाइयों , चाचियों , पत्नी  और सालियों को स्वेटर बुनने को न मिले तो सर्दी किस काम की ? कुछ न कुछ बुनाई का कार्यक्रम चलते रहना ही चाहिए। कभी उन के गोले घर में खत्म होने नहीं चाहिए। इसलिए कभी जर्सी , कभी स्वेटर , कभी मोजे , कभी दस्ताने तो कभी कार्डिगन बुनने का प्रोग्राम निरन्तरता में चलता रहता है। चाहे धूप में बैठकर बुनो या लिहाफ़ में , मनोरंजन औऱ समय व्यतीत करने ,गप्पें लड़ाने का इससे अच्छाअवसर कोई नहीं।आम के आम गुठलियों के दाम। कितना बढ़िया काम। आराम भी काम भी। ये काम केवल और केवल सर्दी में ही होता है। गर्मी या बरसात में नहीं होता। आवश्यकता अविष्कार की जननी जो है।और मज़े की बात ये है कि इस पर एकाधिकार केवल नारियों का ही है। पुरुष वर्ग ये काम नहीं करता । यदि साहस करे भी तो उसके सेक्स चेंज होने का खतरा जो बढ़ जाता है। यदि चेंज नहीं भी हो तो भी वे अपनी ही श्रेणी में बेहिचक शामिल कर लेती हैं।

            अब कुछ ज्यादा ही हो रहा है। तुम्हारे आने के भी कम गुण नहीं। सर्दी की सब्जियां, चने , सरसों के साग की बात ही निराली   है। उसमें भी बाजरे की रोटी , उसका घी मलीदा , ग़ज़क , मूँगफली, फूलों की महकती बहार, भरकाते हुए ऊनी कपड़े , रजाइयां , गद्दे ,कम्बल , शाल, स्वेटर , सूट, कार्डिगन , जरसी आदि न जाने कितने फैशन और उनके रूप , जिनका जिक्र करना तक मुश्किल! बाजार पटे पड़े हैं। दुकानों में ग्राहकों का हज्जुम लगा हुआ है। लग रहा है कि हर ग्राहक जल्दी में है। कहीं माल खत्म न हो जाये ? होड़ लगी हुई है। बच्चों , युवतियों को नए - नए फैशन के गर्म वस्त्र खरीदने की उमंग देखते ही बनती है। जिसकी जेब में जितना पैसा है , उसी नाप तोल में वह पसंद कर रहा है। आख़िर जाड़ा आता ही इसलिए है कि नए -नए फैशन के कपड़ों से देह को सजाया जाए !गर्मी में तो फिर देह दिखाने का कम्पटीशन जो करना है। जितना कम पहनोगे उतने ही आधुनिक कहलाओगे।क्योंकि फैशन के लिए , देह - प्रदर्शन के लिए किसी डिग्री या शैक्षिक योग्यता की जरूरत नहीं है। बल्कि कहना तो यों चाहिए कि योग्यता फैशन नहीं करती। अब ये कहने की भी ज़रूरत नहीं है कि कौन करता है फिर ?  अक्लवन्द को इशारा काफी। समझने वाले / वाली समझ गए , न समझें वे अनाड़ी । चलो अब जा रही हो तो अब जाओ। फिर अगले वर्ष आओ। हमारी ओर से हे सर्दी देवी ! शुभ विदाई। बूढों को सताना मत। जल्दी से आना मत। अब देखो ! माघ मास की पूर्णिमा आने वाली है। वसंत का शुभ आगमन का संकेत मिल गया है। फाल्गुन में टेसू , गेंदा , गुलाब आदि के फूल महकेंगे। होली में नए रंग बिखरेंगे । भरे हुए दिल से तुम्हें हमारी ओर से विनम्र विदाई ! पुनः आगमन के लिए।
 💐शुभमस्तु !
07.02.2020 ◆4.45 अपराह्न।

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

ऋतुओं का राजा आया है [ गीत ] ◆◆■◆◆■◆◆■◆◆■◆◆


✍   रचयिता  ©:
 डॉ.  भगवत स्वरूप 'शुभम'
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ऋतुओं      का   राजा  आया  है।
धरती   पर   स्वर्ग   सजाया  है।।

फूली  सरसों  की कली - कली।
लगती    है कितनी सुघर भली।
खुशबू   ने   जग  भरमाया   है।
ऋतुओं   का  राजा  आया है।।

पादप   से  झरते  पीत  पात।
करते  आपस  में  मधुर बात।
पतझर  की  अद्भुत  माया है।
ऋतुओं    का  राजा  आया है।।

बौराए    हैं    रसाल   कितने।
हँसते खिलखिल गुलाब इतने
गेंदा    प्रसन्न    मुस्काया   है।
ऋतुओं  का  राजा आया है।।

तितली   भँवरों  के  झुंड  चले।
किस  खिले फूल मकरंद मिले
भूं - भूं  कर   गीत  सुनाया है।
ऋतुओं   का  राजा  आया है।।

है  काम  जगा  नर - नारी में।
आकर्षण प्रियतम-प्यारी में।।
तन - मन अंतर महकाया है।
ऋतुओं  का  राजा आया है।।

रागिनी   प्रणय  की  बजती  है।
छिपकर विरहनि नित सजती है।
प्रिय   आज  लौट  घर आया है।
ऋतुओं    का  राजा   आया  है।।

मादकता   मादक   महक रही।
कोयल फुनगी पर  कुहक रही।*
कुक्कड़   -  कूँ  मुर्गा  गाया  है।
ऋतुओं  का    राजा  आया है।।

ठूंठों   में  कोंपल   उग  आई।
पीपल  -  नीमों  में तरुणाई।।
बरगद    की  शीतल  छाया है
ऋतुओं    का राजा आया है।।

सरिता  कलकल कर बहती है।
सागर से कुछ - कुछ कहती है।।
संगम - प्रण  हृदय समाया है।
ऋतुओं  का   राजा   आया  है।।

नीला  नभ  धरती  पर छाया।
ज्योंआलिंगन को झुक आया।
महकती 'शुभम'  नवकाया है।
ऋतुओं   का    राजा   आया है।।
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* वसंत में कुहकने वाला कोयल मादा न होकर नर होता है। तुकांतता  के प्रभाववश यहाँ स्त्रीलिंग में प्रयुक्त किया गया है।
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💐 शुभमस्तु !
05 फरवरी 2020 ◆6.50 अपराह्न।
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ताली का रोगी [ कुण्डलिया ]


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सीमा  में   रवि   नित   रहे ,
कवि       क्यों    सीमाहीन ?
मर्यादाएँ               तोड़कर ,
उछल  -  कूद  कपि - मीन।।
उछल   -  कूद  कपि  -मीन,
नियम    की   शाखा तोड़ी।
उलटी     -   सीधी     चाल,
मंच  -     मर्यादा    छोड़ी।।
'शुभम '    न  समझें   बात ,
तेज   या  कह  लो  धीमा।
अहंकार          में      लीन ,
तोड़ता  है    कवि सीमा।।1।।

सीमा     सबकी   नियत  है,
कवि   क्यों   करता   पार ?
सीमा     के   पालन  बिना ,
नहीं        मिले       उद्धार।।
नहीं       मिले         उद्धार,
क्षम्य   कवि   की मनमानी।
होती      कभी      न    बंधु  ,
तुम्हारी         खींचातानी।।
'शुभम '      साधना   काव्य ,
नहीं        है     कोई     बीमा।
मात्र           प्रशंसा  -  चाह,
न तोड़ो कवि जी सीमा।।2।।

डाली   -   डाली     कूदकर ,
कपि   करता     खिलवाड़।
कभी    आम्रफल    तोड़ता ,
कभी       खींचता     झाड़।।
कभी        खींचता     झाड़,
नीड़      के    फोड़े     अंडा।
नियम       नहीं      कानून ,
नहीं      निर्धारित    फंडा।।
'शुभम '   न कपि की नीति,
न   बजवा   अपनी   ताली।
उछल  -    कूद     को   छोड़,
मूढ़   कवि डाली -  डाली।।3।।

ताली     का   रोगी     हुआ ,
अब   का      कवि   संसार ।
जीता     ताली    के     लिए,
कविता          हो     बेकार।।
कविता          हो       बेकार,
भले   ही    एक      लतीफ़ा।
केवल        फूहड़      हास ,
बन    गए   मंच - ख़लीफ़ा।।
'शुभम '  काव्य    का  चोर ,
लूटता     भर - भर   थाली।
जब       वह   पकड़ा    जाय,
शांत   हो    जाती ताली।।4।।

खेल  नहीं   कविता -सृजन,
नहीं     शब्द  -   खिलवाड़।
हित -   भावों   की  साधना ,
भाव  -  उदय     की  बाड़।।
भाव  -  उदय    की   बाड़,
छंद    के     बंध    निराले।
लय    का    सरल   प्रवाह,
कला     की   छैनी   ढाले।।
'शुभम '   समझकर  खेल,
तू    मत    कर   रेलमपेल।
तप    है   कविता     मीत,
ये  नहीं   बालपन- खेल।।5।।

💐 शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🌷 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

04.02.2020◆2.15 अपराह्न।

ग़ज़ल


  
  उनका        आँसू  शराब   हो जैसे।
  पी       रहा  हूँ  खराब  हो जैसे।।

बस   दिखावे को   कह रहे हैं बुरा ,
उनका  कुर्सी  ही  ख्वाब  हो जैसे।

गीत      गाते   हैं  वो    दिखावे को,
कोई   उन   पर    दबाव    हो जैसे।

मुल्क    में   उनकी  ये सियासत है,
 धर्म -  मज़हब     अज़ाब    हो जैसे।

खुदा   की  तरह  समझता है  'शुभम',
प्यार   दुनियाँ   में   ख्वाब हो जैसे।।

💐शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
   🏆 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

01.02.2020◆8.00अपराह्न.

ग़ज़ल


  
गंगा  के   जल में  बूँद  शराब  हो जैसे।
सियासतदां  अदीब में धुँआब हो जैसे।।

ऊपरी   तौर    से   कहते  हैं बुरा  -बुरा,
सियासत     ही    दिली  ख्वाब हो जैसे।

गीत    गाते   हैं सियासतदां जन का,
किसी नेता का ऊपरी दवाब हो जैसे।

मुल्क चलता नहीं है सियासती चालों से,
अभागे    मुल्क  का  अज़ाब  हो जैसे।

खुदा की तरह न समझें 'शुभम 'इनको,
हर   भलाई    से   इन्हें  दुराव  हो जैसे।।

💐शुभमस्तु !
✍रचयिता ©
🍁 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

01.02.2020◆7.0अपराह्न.

गुरुवार, 30 जनवरी 2020

मैं आदमी हूँ [ व्यंग्य ]


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               आदमी की भाषा में मुझे आदमी कहा जाता है।पशु, पक्षियों ,कीड़े - मकोड़ों,अन्य जलचरों , नभचरों ,थलचरों की भाषा में चाहे कुछ भी कहा जाता हो ।आदमी को अपने आदमीपन का बड़ा अभिमान है।वह कहता है कि वह सर्वाधिक बुद्धिमान है। इसका उसे बड़ा ही गुमान है। इसलिए वह अपने को कहता है कि वह इंसान है।सबसे महान है। उसका आदमी होना ही उसकी शान है , पहचान है। 

       आदमी या इंसान में कुछ विशेषताएँ पशु -पक्षियों के समान हैं । जैसे आहार , निद्रा ,भय और मैथुन ये चार काम ।यदि आदमी को इन पशु आदि यौनियों से कोई अलग करता है , तो वह धर्म है।अपनी - अपनी देह और यौनि के अनुसार अन्य यौनियों में दिमाग भी होता है। सबसे अधिक बुद्धमता का नतीजा यह है कि उसने सभ्यता का विकास भी कर लिया है ,इसलिए अन्य सभी यौनियों को वह अपना दास या अधीनस्थ ही मानता है। उसकी इसी अति बुद्धिमता का परिणाम है कि वह जितना धर्म से बंधा हुआ है , उतना ही नियम -भंजक भी है।

       आदमी को वफ़ादार नहीं माना जा सकता। यदि वह वफ़ादार हो गया ,तो उसके अदमीपन के स्तर में उतार आ जायेगा। वह आदमी के उच्च आसन से गिरकर पशुओं की श्रेणी में रख दिया जाएगा। चूँकि वफादारी का तमगा उसने कुत्ते के गले में जो डाल दिया है। आदमी के वफ़ादार होने पर वह आदमी नहीं रह जायेगा। कोई कुत्ता नियम तोड़े या न तोड़े , लेकिन जब तक वह नियम नहीं तोड़ लेगा , उसे आदमी कौन कहेगा? वह आदमी ही कैसा जो नियम न तोड़े। आदमी जितना ऊपर के पायदानों पर चढ़ता जाता है, उतना ही अधिक नियम तोड़ने के प्रति उसकी बुद्धि कुलांचें मारने लगती है।अनैतिक कार्य करना , झूठ बोलना, राजमार्गों के नियम तोड़कर कर अदा न करना, मुफ़्त की सुविधाएं हासिल करके अपने को अभिजात सिद्ध करना, दूसरों की संपत्ति , स्त्री , जमीन आदि पर कब्जा कर लेना , अपने बच्चों में गुंडा तत्वों का अधिक से अधिक समावेश करना, कोरी हेकड़ी का रॉब गाँठना , राजनीति के छाते के नीचे वे सब अकर्म, सुकर्म , कुकर्म करना उसकी योग्यता बन जाती है।

              पढ़ -लिखकर उसमें अपराध करके सफ़ाई देने की चातुरी के विशेष गुण का स्वतः समावेश हो जाता है। पढ़ा - लिखा आदमी यदि राजनीति की खाल ओढ़ ले ,तो 'करेला फिर नीम चढ़ा' : वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो जाती है। 'समरथ को नहिं दोष गुसाईं ' के अनुसार आदमी को फिर तो कुकर्म औऱ सुकर्म में भी अंतर दिखना बन्द हो जाता है। उसके लिए कोई भी कर्म न पाप रह जाता है और न पुण्य ही। वह पाप -पुण्य के स्तर से ऊँचा उठ जाता है। पुण्य में भी पाप की गठरी अपने आप भारी होने लगती है। वह अपने को सर्वाधिक गुणी औऱ सशक्त मानने लगता है।औऱ उधर कुत्ता कुत्ता ही बना रह जाता है । आदमी तो भेड़िया , गिद्ध , चील ,दोमुंहा साँप जैसी विविध उपाधियों से सुसज्जित होता हुआ उस परम हंस गति को पा लेता है कि वह यह भी विस्मृत हो जाता है कि वह कौन था , कौन है औऱ अब क्या हो गया है!

                  सबसे महत्वपूर्ण बात है कि आदमी अपनी एक मनुष्य यौनि में कई सारी यौनियों के सुख समय -समय पर भोग लेता है। वह माने या नहीं माने , पर कभी वह कुत्ता भी होता है जब बॉस के सामने अपनी अदृश्य पूँछ हिलाता है।सुअर , गधा, गिद्ध , चील आदि सभी के स्वाद लेता है वह। जब काम पिपासा में नीति -अनीति भूल जाता है ,तब उसे सुअर, श्वान कुछ भी कह सकते हैं।जब दूसरों के धन और तन को निर्मम होकर नोंचता - खसोटता है तब वह गिद्ध, मच्छर, चील ,कौवा, जैसी यौनि का प्राणी होता है। संभवतः इसीलिए कुछ मनीषी कह गए हैं :
 पहले पशु है आदमी, और बाद में अन्य।
 तेरी करनी के लिए, तुझे धन्य ही धन्य।।
 💐शुभमस्तु !
 ✍लेखक ©
🤓 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'
 30.1.2020●3.55अपराह्न
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किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...