251/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
नाल मेढकी ने ठुकवाई।
बड़े जोर से यह चिल्लाई।।
'मारेगा क्या मुझे कसाई।
अरे बचाओ चाची ताई।।'
तिलचट्टे मच्छर भी आए।
जंतर मंतर पर जा छाए।।
नाच -कूदकर शोर मचाते।
गाली- दान यहाँ कर जाते।।
अमरीका ने इन्हें पठाया।
धन के लालच से उकसाया।।
भेज रहे हम भोजन-पानी।
करें तुम्हारी हम निगरानी।।
भारत में बरबादी लाओ।
मिला धूल में चैन न पाओ।।
सत्तासन को ऐसे फेंको।
बुरे बोल कह उनसे रेंको।।
बको गालियाँ नेताओं को।
नहीं बख्सना तुम मांओं को।।
त्राहिमाम जनता चिल्लाए।
नहीं चैन से जीने पाए।।
बनकर जौंक मसक तिलचट्टे।
उठा हाथ बम अपने कट्टे।।
भय का भाव भरो हे भाई।
मारो पुलिस करो कुटिलाई।।
भय से भूत नहीं क्यों भागें।
तोड़ मनुज की दो दो टाँगें।।
हाय!- हाय !! जब होगी भारी।
सहज समर्पण की तैयारी।।
करना ही निज उल्लू सीधा।
ऊजड़ हो यद्यपि हर बीघा।।
खंडन ही है लक्ष्य हमारा।
दिखे देश को दिन में तारा।।
शुभमस्तु,
02.08.2026◆11.30आ०मा०
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रविवार, 2 अगस्त 2026
नाल मेढकी ने ठुकवाई [ चौपाई ]
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