252/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
बचा कहाँ अब जीवन-रस है !
शिथिल आदमी की नस -नस है।।
संविधान अब नहीं सदन में,
रखा ताक पर वह बेबस है।
ठग बैठे हैं बनकर शासक,
जिनका भेजा बिलकुल ठस है।
कहाँ व्यवस्था बची देश में,
शिक्षा सारी तहस-नहस है।
जिनको कहें ज्ञान की बातें,
करे उलट वह बुरी बहस है।
अत्याचार भ्रष्टता बढ़ती,
कॉकरोच क्या टस से मस है?
'शुभम्' मौन धर रहा न जाए,
चले यहाँ पर चल सर्कस है।
शुभमस्तु,
02.08.2026 12.00 मध्याह्न
◆●◆
रविवार, 2 अगस्त 2026
बचा कहाँ अब जीवन-रस है [ गीतिका ]
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
किनारे पर खड़ा दरख़्त
मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें