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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मान और अपमान ,से सिद्ध सियासत पूर्ण।
स्वीकृत जूता जेल भी,अहंकार सब चूर्ण।।
सहनशीलता धन्य है,नेताओं की खूब।
उगते वे उस खेत में,जहाँ न उगती दूब।।
यदि नेता होते नहीं, करता कौन विकास।
देश न रहता देश में, नहीं देश के पास।।
बंजर ऊसर खेत में,उगे न कोई घास।
नेता फलते -फूलते, महक सुँघाते खास।।
जिस घर में नेता उगे, खुले पिता के भाग।
सोना-चाँदी बरसता, जगे देश-अनुराग।।
मात-पिता वे धन्य हैं, जिनके नेता पुत्र।
रहें पड़ौसी काँपते, कहें रहें अब कुत्र।।
ज्यों गेहूँ के खेत में, उगते खरपतवार।
त्यों उगते नेता यहाँ, नगर गाँव के भार।।
नियम नहीं इनके लिए, और न शेष विधान।
पिछड़ा वही समाज है, नेताओं की खान।।
राहजनी चोरी सदा, जिनके व्यसन अनेक।
व्यभिचारी नेता जहाँ, कार्य सफल क्यों नेक।।
दुष्कर्मों के बीज से, जिनका जन्म महान।
वे समाज के बीच में, मूँछ रहे निज तान।।
गाली और गलौज से, चलता जिनका काम।
दुर्भागी वह देश है, ठगे जा रहे राम।।
शुभमस्तु,
02.08.2026◆ 10.45 आ०मा०
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