गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

मेरी खुशी [ अतुकांतिका ]

 150/2026


              

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मेरी अपनी खुशी

तुम्हारी या किसी की

'हाँ' में नहीं है,

वह नित्य और निरंतर

मेरे ही पास है।


तुम अपने-अपने

पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो

तुम्हारी सोच 

सीमित है वहीं तक,

परंतु मुझे इससे क्या!

मैं आज भी 

अपने स्थान पर अविचल हूँ

अटल हूँ,

और उसी पर 

करता भी अमल हूँ।


मुझे नहीं चाहिए

तुम्हारे 'लाइक'

हजारों लाखों करोड़ों

तुम सभी भी तो

परिस्थितियों के दास हो,

मैं जैसा भी हूँ

अपनी जगह पर दुरुस्त हूँ,

मस्त हूँ,

संतुष्ट हूँ।


क्यों मरे जाते हो

इन चुटकुलों की हँसी पर

कोरी वाहवाही 

किसी काम की नहीं है,

ये वादों में बँधे हुए लोग हैं,

जातिवाद,क्षेत्रवाद,

शहरवाद, प्रांतवाद,

मज़हब वाद

गाद ही गाद।


नहीं हूँ मैं किसी और की

इच्छाओं  और  

प्रशस्तियों का दास,

मेरे अपने मन में 

बसता है शारदा माँ  का उजास

उन्हीं के आदेश का 

अनुपालक हूँ

शब्दकार हूँ,

मैं अपने कर्म से प्रसन्न हूँ

संतुष्ट हूँ,

सद्भावों से परिपुष्ट हूँ।


शुभमस्तु,


30.04.2026◆5.00प०मा०

                ◆◆◆

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