बुधवार, 15 जुलाई 2026

हलधर वीर किसान [गीत]

 235/2026


   

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


स्वेद सिक्त तन

चला खेत पर

हलधर वीर किसान।


कहता जगत

अन्न का दाता

 भरता सबके पेट

भूखा और

नग्न तन रहता

सबका ही आखेट

कंधे पर हल रखे

चला है

कृषता का संधान।


एक हाथ में

पात्र सलिल का

नग्न पाँव भू टेक

जुआ लटकता

उसके आगे

जाग्रत सदा विवेक

धैर्य धरे

वह कृषक तपस्वी

कर भू का गुणगान।


जीता सदा

अभावों में ही

नहीं कुशलता खैर

अपने ही

पैरों पर चलता

नहीं किसी से बैर

आँधी पानी

धूल धूप की

उसे नहीं पहचान।


भूखे प्यासे 

बाल कलपते

फटे तिया के चीर

प्याज नमक से

रोटी खाते

मन में धरते धीर

इज्जत नहीं

आन की खातिर

जिंदा  कृषक महान।


शुभमस्तु,


13.07.2026◆10.30प०मा०

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