291/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
आशा के ही साथ में,सदा निराशा वास।
अपनी टाँग अड़ा रही,संग ले रही श्वास।।
संग ले रही श्वास, एक पल दूर न जाए।
खंडित कर विश्वास, उसे पथ से भटकाए।।
रहना 'शुभम्' सचेत, नहीं हो उलटा पाशा।
छोड़ निराशा बंधु, थाम कर उज्ज्वल आशा।।
-2-
झूले में नर झूलता, आश-निराशा बीच।
दोलन ही होता रहे,रही निराशा सींच।।
रही निराशा सींच,डिगाती प्रति पल रहती।
आशा के कर खींच, बात बेढब ही कहती।।
'शुभम्' न व्यक्ति प्रबुद्ध,कभी निज आशा भूले।
न दे निराशा साथ, नहीं भटके पथ झूले।।
-3-
आशा को मत छोड़िए,चिंतन रहे सकार।
नहीं निराशा पास में, पल को फटके द्वार।।
पल को फटके द्वार, दिशा सुथरी मिल जाएँ।
भटकन से रह दूर, दिशाएँ लोरी गाएँ।।
'शुभम्' न मन में देख, एक पल कभी दुराशा।
महक रहा ज्यों फूल, महकती हो वह आशा।।
-4-
चढ़ती चींटी शृंग पर, विजय पताका साथ।
न हो निराशा लेश भी,सदा उच्च रख माथ।।
सदा उच्च रख माथ, निरंतर बढ़ती जाती।
करती पंथ प्रशस्त, हंसिनी-सी मुस्काती।।
'शुभम्' न कोई दोष, किसी के सिर पर मढ़ती।
तप में रहती लीन, शृंग के ऊपर चढ़ती।।
-5-
कछुआ सँग खरगोश की,दौड़ न भूले लोग।
आशा में कछुआ रहा, न था निराशा-रोग।।
न था निराशा-रोग,शशक तरुवर तल सोया।
हार गया वह दौड़, अंत में भारी रोया।
'शुभम्' न हुआ निराश,सदा आशा का सतुआ।
पिया करे रस घोल, चला ज्यों पथ में कछुआ।।
शुभमस्तु,
18.09.2026◆5.45 आ०मा०
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