शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

अरे नादान! [ गीतिका ]

 321/2026



         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हम   कलयुग   के भगवान, अरे नादान!

सबसे    ऊँची   है    शान, अरे  नादान!!


कितना भी  पढ़ ले   किंतु, चलेगी  मेरी,

सबसे  मैं सदा    महान,  अरे    नादान!!


सिर   पर  है    मेरे   ताज,  चाकरी  तेरी,

जनता   करती     गुणगान,  अरे  नादान!


सौ-सौ   एकड़   हो खेत,   करे मजदूरी,

घर   पर     टूटी   ही छान,  अरे  नादान!


पढ़ते     बालक   परदेश,   हमारे    सारे,

वे   भरते     फिरें   उफ़ान,   अरे नादान!


बीबियाँ   हमारी   चार ,  रोक   ले   कोई,

हम   भले   अपढ़    अज्ञान, अरे नादान!


हेकड़ी   हिमाक़त   धौंस ,  हमारे   गहने,

किसी  से हमें नहीं कम  जान,अरे नादान!


शुभमस्तु,


01.10.2026 ◆ 4.45 प०मा०

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