327/2026
© शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
बदले नहीं खुद आप, कैसे देश बदलो।
देते सदा संताप, कैसे देश बदलो।।
भरते तिजोरी जेब, अपनी आम इंसां,
अपराध के तुम बाप, कैसे देश बदलो।
करनी तुम्हें थी लूट, क्या फिर देश सेवा,
करते कनक का जाप, कैसे देश बदलो।
पहनी जाति की पतलून,कुर्ता बगबगा- सा,
जिसकी न कोई माप, कैसे देश बदलो।
सुनते सभी घड़ियाल,वे ही अश्रु झूठे,
भरते हुए आलाप, कैसे देश बदलो।
कुटिल शोषणता समाई, बुद्धि में तव,
करते रहे हो पाप, कैसे देश बदलो।
चलना नहीं कुछ काम,तेरे बिन यहाँ का,
तेरी 'शुभम्' कब छाप, कैसे देश बदलो।
शुभमस्तु,
02.10.2026◆3.45 आ०मा०
(रात्रि)
◆●◆
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें