325/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
दिखलाते थोथा प्यार,चले वे आए।
वे सभी रहे बटमार, चले वे आए।।
ले विजय पताका साथ,न्यायविद भारी,
धड़-धड़ करती है थार, चले वे आए।
मौसम का उड़ता रंग, खेलते होली,
श्वानी-श्वानों को क्वार, चले वे आए।
कीचड़ का साम्राज्य, यहाँ पर छाया,
रक्तिम इनका व्यापार, चले वे आए।
क्या शहर और क्या गाँव,कोहरा भारी,
जातीय जटिल तकरार, चले वे आए।
जनता में डालो फूट, लड़ाओ इनको,
छलकाते भाटा -ज्वार, चले वे आए।
ले 'शुभम्' इन्हें पहचान, सभी ठग देशी,
किंचित ये नहीं उदार, चले वे आए।।
शुभमस्तु,
02.10.2026◆2.15आ०मा० (रात्रि)
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