शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

धीरज [ कुंडलिया ]

 322/2026



       


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


                         -1-

नारी धीरज  धर्म  की, सुहृद सखा  पहचान।

होती  आपद काल   में, तनता  मान  वितान।।

तनता    मान   वितान, मिटें   सारी  बाधाएँ।

बढ़े  हृदय   विश्वास, गगन   में गीत गुँजाएँ।।

'शुभम्' परख ले आज,सभी की महिमा न्यारी।

सजें सुगम सब   काज,सखा  धीरज या नारी।।


                            -2-

धीरज जो   धारण करे, मन में रहती शांति।

समझ सोच  कर्तव्य  को,करता रहे न भ्रांति।।

करता रहे  न  भ्रांति,राह कछुआ की चलता।

नहीं  मारता टाँग,किसी को कभी न  छलता।।

'शुभम्'   महकता  फूल, ताल  में जैसे नीरज।

सदा  सफलता  आप,दमकता जन  में धीरज।।


                           -3-

खोया    धीरज  आपने,  तो  न  बचेगा  चैन।

चिंतित  हो  भटके    रहें, संभ्रम  हो दिन-रैन।।

संभ्रम   हो  दिन-रैन, सफलता   खोती सारी।

नसे  आत्मविश्वास,  विकलता  की   बीमारी।।

'शुभम्'  मिले  वह   पेड़, बीज  जो जैसा बोया।

सुख की हो  सब   रेड़,अगर धीरज को खोया।।


                         -4-

धीरज   धृति   संयम  सभी,  शब्द रूप  पर्याय।

शांति सब्र   ढाढ़स  करें,  वृद्धि विमल अध्याय।।

वृद्धि   विमल  अध्याय, हृदय को करते   पावन।

करते    अन्य    उपाय, उमस में ज्यों ऋतु सावन।।

उगते  'शुभम्'    सरोज,  ताल   के मैले   क्षीरज।

उर  में    अमल  अपार, महक त्यों जाता  धीरज।।


                        -5-

धीरज   के   मैदान    में, रुकें    नहीं खरगोश।

विकल   भ्रांत  बकलोल- से, दौड़   रहे बेहोश।।

दौड़   रहे    बेहोश,  क्षणिक  देखें  कब पीछे।

मन में   भरता  रोष, युगल  निज ऑंखें मीचे।।

'शुभम्' कमठ की चाल,लगे ज्यों आता वीरज।

रखे   हृदय में शांत, मौन   का अपना धीरज।।


शुभमस्तु,


01.10.2026◆ 5.30 प०मा०

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