शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

खुजा ले खूब खुजा ले [ गीतिका ]

 326/2026


     


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


मधु राजनीति की खाज,खुजा ले खूब खुजा ले।

तज हया शरम भी लाज,खुजा ले खूब खुजा ले।।


अपने   घर   को   दे   फूँक,साथ   चल  इनके,

कर  नेताजी  पर  नाज, खुजा ले  खूब खुजा ले।


चिकनी   गागर     पर   नेंक ,न   पानी टिकता,

तू गिरा स्वयं पर गाज, खुजा   ले खूब खुजा ले।


वे     बड़े     भगौना     देग,   रहे    तू   चमचा,

वे सदा   रहे   सरताज,  खुजा ले खूब खुजा ले।


कर      में   चाँदी   की  थाम,  एक   चम्मच   वे ,

करते अपने  सब काज, खुजा  ले खूब खुजा ले।


हर    नैतिकता    दी    बेच,   नहीं   कुछ  बाकी,

सज गया सकल सुख साज,खुजा ले खूब खुजा ले।


आया    जो    करने    काम, वही  सब  करता,

है 'शुभम्' यही सब राज, खुजा ले खूब खुजा ले।


शुभमस्तु,


02.10.2026◆3.00आ०मा० (रात्रि)

                  ◆●◆

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...