शनिवार, 2 जनवरी 2021

सदा शिवम हो साल [ दोहा -ग़ज़ल ]


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️ शब्दकार ©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

मन में  नई  तरंग हो,जीवन हो खुशहाल।

नया साल हर पल रहे,हो कोई भी   काल।।


सत्पथ ही निज ध्येय हो,सत्संगति का साथ,

बाधाएँ  सब  दूर  हों,  भरा रहे   उर -थाल।


स्वस्थ देह का साथ हो,आवश्यक धन हाथ,

संतति  माने  बात को,धन संतोष    बहाल।


इच्छाएँ  सीमित   रहें,  ज्ञान अंनत   अबाध,

व्यसन मुक्त जीवन सदा,मुक्ता चुगें  मराल।


पत्नी  सदा सुलक्षणा,संतति हो  गुणवान,

चिंताओं  से मुक्त हो,मानवता की    चाल।


ईर्ष्या,  द्वेष न शेष हो,करुणा, नेह,  ममत्व,

दया,धर्म, शुभ कर्म की,जलती रहे मशाल।


'शुभम'सदा स्वागत करें,पूजनीय पितु  मात, 

गुरुजन का सम्मान हो,सदा शिवम हो साल।


💐 शुभमस्तु !


01.01.2021◆3.30 अपराह्न।

  सरस्वती -स्तवन

               [ चौपाई  ]

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️ शब्दकार©

🪴 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

उर  में   मातु   शारदे  आओ।

वीणा की  झनकार सुनाओ।।


शब्द-शब्द  में  भर दो गुंजन।

अक्षर-अक्षर स्वर औ'व्यंजन।


करता मैं   कर  जोड़े विनती।

बारहखड़ी सिखाओ गिनती।


आराधक   मैं     माता   तेरा।

काव्य- ज्ञान  दे  सदा घनेरा।।


हंसवाहिनी,     वीणावादिनि।

श्रीप्रदा माँ ज्ञान- निनादिनि।।


विमला, वसुधा ,सुरसा ,देवी।

भगवत सदा  रहे  पद सेवी।।


सुरपूजिता,   सुनासा,  विद्या।

त्रिगुणा,शुभदा मिटा अविद्या।


सौम्या, कामप्रदा,  माँ कांता।

नीलभुजा,अम्बिका,सुशांता।।


विद्यारूपा ,       पद्मलोचना।

सौदामिनि  , माँ पापमोचना।।


माँ गोमती,  भोगदा,   भामा।

गोविंदा, माँ  शिवा, सुनामा।।


विधुवदनी,   वैष्णवी ,सुमाता।

'शुभम'सदा माँ तुझको ध्याता।


🎍 शुभमस्तु !


01.01.2021◆4.00अपराह्न।


गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

जनता आलू -कंद [कुण्डलिया]


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️ शब्दकार ©

🦢 डॉ. भगवत स्वरूप  'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

                   -1-

जनता आलू- कंद है,रहती सबके  साथ।

गोभी बैंगन मटर सँग,होता उसका हाथ।।

होता  उसका हाथ,  कूटकर पापड़  बेलें।

काटें  सुंदर चीप,चमक रैपर की    झेलें।।

'शुभम'न मौका चूक,काम जब तेरा बनता।

'जाय भाड़ में देश', यही कहती है जनता।।


                  -2-

जनता    आलू-  कंद  है,होती है      बेस्वाद।

यदि  गोभी  के साथ हो,गोभी हो  आबाद।।

गोभी   हो     आबाद, तरसते बैंगन    सारे।

पड़े - पड़े  ललचाएँ , पड़े हैं नदी  किनारे।।

'शुभम' रसीला झोल,कभी है सूखा  बनता।

जितना दो गुड़ डाल,मधुर हो उतनी जनता


                      -3-

जनता   आलू -  कंद है,ऊपर माटी    धूल।

कब वह किसके साथ हो,कब जाएगी भूल।।

कब   जाएगी भूल, किसे सिर पर   बैठाए।

किसको दे संन्यास,किसे कुर्सी   दे  जाए।।

'शुभम'न समझें भेड़, ऊन से कंबल बनता।

करती यही कमाल, मतों से मारे  जनता।।


                 -4-

जनता आलू  -  कंद है, लुढ़के गोल  मटोल।

चाहे कोई मोल दो ,बिक जाए बे  -   मोल।।

बिक  जाए बे - मोल,बनाए गर्दभ   राजा।

कहते नेता लोग,  हमारे सँग में  आ   जा।।

'शुभं'न समझें चाल,काल आलू जब बनता।

अटक कंठ के बीच,हँस रही आलू जनता।।


                   -5-

जनता   आलू -  कंद   है, मोटे छिलकेदार।

छिलका हटता है तभी,पता लगे किरदार।।

पता  लगे  किरदार, छीलने वाला   जाने।

है वह जड़ मतिमंद,उसे जो अपना   माने।।

'शुभम'मटर के साथ,और ही सरगम बनता।

धुँधली  धूल  गुबार , भरी है आलू  जनता।।


💐 शुभमस्तु !


31.12.2020◆4.00अपराह्न

नेता ही भगवान [ दोहा ]


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️ शब्दकार ©

🍃 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

नेता ही भगवान है,जनता पूजक भक्त।

पूँछ बनी भेड़ें सभी,सत्तासन अनुरक्त।।


चला  बवंडर  देश  में, जनता रजकण मात्र।

पीछे  चलने को बनी,मात्र भेड़  ही    पात्र।।


जनताअब जनता नहीं,मतदाता मतिहीन।

खोए हैं अधिकार सब,राजनीति का दीन।।


खोकर के जनबोध को,हुई विसर्जित आज

जनता है कण धूल का,देखे चम चम ताज।।


'पट भी मेरी चित्त भी,मुझे चाहिए जीत।

अंटा  मेरे  बाप का,शत्रु न कोई   मीत।।'


उनमें सब अवगुण भरे,मैं ही गुण की खान।

बिना  मिले सत्ता मुझे,सूख रहे  हैं   प्रान।।


चाहे   बेचें  देश  हम, चाहे  बनें   गुलाम।

अर्थ जाय पाताल में,फिर भी करो प्रनाम।।


राजनीति में झूठ का,   बहुत बड़ा है योग।

अंधा  बाँटे  रेवड़ी, करें  मीत ही    भोग।।


सत्ता  सच  से  दूर  है, अस्त्र हमारा  झूठ।

अपनों को वरदान हम, बंद सभी को मूठ।।


जनता तो बस आम है,चुसना उसका काम।

चाहें निकले प्राण ही,फिर भी करें   प्रनाम।।


भोले -से वे लोग हैं, हम भाले की नोंक।

खुश होते नारे लगा,भले आग में झोंक।।


💐 शुभमस्तु !


31.12.2020◆2.30अपराह्न।


हर समय नसीहत [ गीत ]


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️ शब्दकार©

🏕️ डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

हर समय  नसीहत मिलती है,

क्या आँख  कान  अंधे बहरे?

क्षण- क्षण मानव को सिखा रहा,

दे   देकर    तेरे    दर   पहरे।।


आती   है    कभी   महामारी,

भूकम्प  कभी   आ जाता  है।

अतिवृष्टि कभी सूखा अकाल,

नर ही  नर को  खा जाता है।।

ये कालचक्र  रुकता न  कभी,

कुछ  दाग  छोड़ता  है  गहरे।

हर समय नसीहत मिलती है,

क्या आँख कान अंधे  बहरे??


बाहर    बदबू   भीतर   बदबू,

पावनता   खोज  रहा मानव।

हैं   काम   बुरे,  खोटे,   खट्टे,

बन जाता है   मानव  दानव।।

गीदड़  ने खाल ओढ़  ली  है ,

छिप  रहे  मुखौटे   में  चहरे।

हर समय नसीहत मिलती है,

क्या आँख कान अंधे बहरे??


पशु मानव में अब होड़ लगी,

पशुता  ही   पहले  जीती  है।

मानवता तो  बस   ढोंग शेष,

कर्मों   की  गागर  रीती  है।।

भगवान   बने  पुजते   नेता,

जो जहर भरे  घट  हैं  गहरे।

हर समय नसीहत मिलती है,

क्या आँख कान अंधे बहरे??


कंचन कामिनि का दास बना,

नर   धर्मदास    कहलाता  है।

रँग कर तन  पर  चीवर पहने,

वह व्यास  बना पुजवाता है।।

ढोंगी   संसार    मान    पाता,

उसकी ही ध्वजा आज फहरे।

हर समय  नसीहत मिलती है,

क्या आँख कान अंधे  बहरे??


सत्ता   पर    गुंडे   काबिज़ हैं,

काबिल  की  कोई  पूछ नहीं।

भेड़ों   की   भीड़  चले  पीछे,

होती  है   उसकी  पूँछ नहीं।।

तानाशाही       के     बलबूते,

जनता   भोली  उनसे  थहरे।

हर समय नसीहत मिलती है,

क्या आँख कान अंधे बहरे??


'चित भी  मेरी  पट  भी  मेरी,

अंटा   है    मेरे   बापू    का।'

है 'शुभम'सियासतआज यही,

अंधे  भक्तों  के   टापू   का ।।

हर   तरह   हमारी  हो सत्ता,

हैं   बने  देश  के   वह महरे।

हर समय नसीहत मिलती है,

क्या आँख कान अंधे बहरे??


*थहरे=थर्राती है।

*महरे=पूज्य,श्रेष्ठ,मुखिया।


💐 शुभमस्तु !


31.12.2020◆11.45पूर्वाह्न।

बवंडर में धूल का कण बनाम जनता [अतुकान्तिका]


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

✍️ शब्दकार ©

🍁 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆

आज की जनता ने

अपना जनता होने का

जनतात्व - बोध

समग्रतः 

विसर्जित कर दिया है

मात्र  एक  नेता में।

आज वह 

अपने अंधत्व में 

खाली है,

ज्यों जनतंत्र में

चौपालों पर सुलगती हुई

पराली है।


आज की जनता

नहीं रही अब जनता,

जनता का जनबोध

खोखला ही तनता, 

वह मतदाता भी

 नहीं है,

जो वह मान ले

वही सही है।


आज की जनता है

धूल का एक कण

निर्जीव ,

अस्तित्वविहीन,

किसी बवंडर के पीछे

उड़ने वाला 

मात्र तिनका।


जनता का अस्तित्व

उसका महत्त्व

नष्ट किया जा रहा है,

मगर उसे

राजनीति को

 विकृत करने में

  परम आनंद

  आ रहा है,

आज जनता

 राजनीति की

चहेती बन गई है

अपने ही आत्मघाती 

भविष्य के लिए।


कोई भी जनता

जब बन जाती है भक्त,

किसी दल

 या नेता में

अनुरक्त,

नष्ट हो जाता है

उसका विवेक,

नहीं रह पाती

 वह नेक,

नहीं कर पाती

सत्य का अभिषेक,

बनकर रह जाती 

मात्र बरसाती भेक,

दलों के दलदल में

लथपथ

बस टर्र- टर्र की टेक!


बवंडर के पीछे 

उड़ता हुआ

धूल का कण,

जनता  के 

दुखते हुए वृण,

दिन प्रति दिन

क्षण-क्षण।


💐 शुभमस्तु !


30.12.2020◆3.30अपराह्न।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

समय सत्य का त्राता [ गीत ]

 

♾️♾️♾️♾️♾️♾️♾️♾️

✍️ शब्दकार ©

🦢 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

♾️♾️♾️♾️♾️♾️♾️♾️

हर साल  नया होकर आता।

मैं समय, सत्य का ही त्राता।।


मैं  बुरा  नहीं   अच्छा  होता।

अनवरत  बहे   मेरा  सोता।।

अच्छा कोई   बद  बतलाता।

मैं समय,सत्य का ही त्राता।।


मैं ब्रह्म,  सत्य का वाचक हूँ।

मैं नहीं जगत का याचक हूँ।।

यह सत्य तथ्य मैं समझाता।

मैं समय,सत्य का ही त्राता।।


सबके कर अलग तराजू है।

कुछ वाम दाहिनी बाजू है।।

सबको मैं नहीं कभी भाता।

मैं समय,सत्य का ही त्राता।।


सरिता     में    मुर्दे   बहते हैं।

कुछ धार चीर  कर  रहते हैं।।

मुझको तो बस चलना आता।

मैं समय, सत्य का ही त्राता।।


मैं तो  तटस्थ  नित रहता हूँ।

यह गूढ़ सत्य  मैं कहता हूँ।।

तव कर्म नए फल का दाता।

मैं समय,सत्य का ही त्राता।।


तुम ईश,काल,यमपाश कहो।

या धर्मराज  का वास कहो।।

नीमों में  आम  नहीं  लाता।

मैं समय,सत्य का ही त्राता।।


जिसको साला वह साल कहे।

जिसको माला वह माल कहे।।

मैं वर्ष,  वर्ष   में   ही  आता।

मैं समय,सत्य का ही त्राता।।


मैं 'शुभम'अशुभ कुछ भी मानो।

कर्मों  का  फ़ल  मुझसे जानो।।

माया  में  मनुज   भूल  जाता।

मैं समय, सत्य  का  ही त्राता।।


💐 शुभमस्तु !!

29.12.2020◆4.30 अपराह्न 


किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...