शनिवार, 23 मार्च 2019

जबर मारे और रोने भी न दे (व्यंग्य)

   राजनीतिक शब्दावली में जनता को जनार्दन कहा जाता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे किसी मूर्ख को पोदीने के पेड़ पर चढ़ा दिया जाए। इसका तात्पर्य समझाने बताने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि आप तो बहुत बड़े समझदार हैं ही।इसी प्रकार देश के राजनेता कहते हैं ,जनता जनार्दन है। जनार्दन अर्थात भगवान। ऐसा इसलिए कि उसके वोट से सरकारें बनती बिगड़ती हैं। बस इतनी सी बात के लिए तो जनता ईश्वर है , भगवान है, परमात्मा है , नियन्ता है। लेकिन सरकारें बनने के बाद उसका भगवानत्व उससे छीन लिया जाता है।उसे उसके भगवानत्व से हीन किया जाता है। फिर वह जनार्दन नहीं रह जाती। कही जरूर जाती है। पर कहने और करने में भगवान और भिखारी का अंतर है। जनता का यह तत्व नेता में स्थानांतरित हो जाता है।
   इतना ही नहीं आगे चलकर तो यह लोकोक्ति शत प्रतिशत कसौटी पर खरी उतरने लगती है कि " जबर मारे औऱ रोने भी न दे "। सरकार सत्ता और नेताओं के प्रति कुछ भी लिखने और बोलने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। वही बोलो जो सत्ता चाहे, वही लिखो जो सताने वाला चाहे, वही वीडियो और डालो जो उनके वोट बैंक के ए टी एम को खाली न कर दे। उनके वोट बैंक के वीडियो को गोबर पर क्रीम लगाकर पेश करो। कीचड़ की बदबू को सुंदर -सुंदर लाल महकते फूलों से ढांक दो। बस फूल ही फूल दिखने चाहिए। कीचड़ नज़र न आ जाए। इसलिए विरोधियों के विषय में कुछ भी कहो, पर उनको प्रकाशित न करो। यदि किसी ने हिमाकत की , तो उसे अमुक -अमुक धारा में कैद में डाल दिया जाएगा।जुबान पर ताला लगा के रखो। ऐसा वैसा बोला कि हथकड़ियाँ तैयार। क़ानून की भाषा में इसको तानाशाही कहा जाता है। जनता की जीभ पर सेलोटेप चिपका कर वही कहलवाना जो वे चाहते हैं,इसी को कहते हैं जबर मारे और रोने भी न दे।
वे ज़ुल्म भी करते हैं
 तो शिकवा नहीं होता, 
हम आह भी भरते हैं तो 
हो जाते हैं बदनाम। 
   कभी -कभी यह सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि क्या इसी प्रजातंत्र कहा गया है? क्या जनता को तानाशाही की भट्टी में झोंकना शासकों का अनिवार्य धर्म है? क्या इसीलिए जनता को जनार्दन कहा गया है? विष्णु भगवान पर भी जो ताना शाही का चाबुक चला दे , वह कोई महा भगवान ही हो सकता है। चित भी मेरी पट भी मेरी , अंटा मेरे बाप का। इसी को कहते हैं। टीवी चैनल और अख़बार तो बिक गए ,अब जनता को भी खरीदने की फूल प्रूफ तैयारी है। जनता तो मुर्गी का चूजा है , दबा लो पंजे में । जाएगी तो जाएगी कहाँ! यदि दब गई तो ठीक , नहीं तो गर्दन मरोड़कर नाश्ते के काम आ ही जाएगी। बेचारी जो ठहरी। जनता जनार्दन नहीं, उनका जर्दा तन है।वोटवर्धन है। पुरानी कहावत ग़लत नहीं हो सकती : जबर मारे ,और रोने भी न दे। आज के संदर्भों में सोलहों आने सच है । चालीस सेरा सच है।

💐शुभमस्तु !
🤡 लेखक ©
डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'!

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