257/2026
समांत : आल
पदांत : अपदांत
मात्राभार : 24.
मात्रा पतन :शून्य।
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
देख तरक्की देश की,फन फैलाए व्याल।
अवसर देखें छद्म से, बने हुए हैं काल।।
कुटिल दृष्टि है गीध की,कॉकरोच बहु कीट।
आग लगाएँ देश में, दूषित करते हाल।।
छिड़ी हुई हैं विश्व में, आधिपत्य की जंग।
बुझी पड़ीं आचार की,शुभता सृजित मशाल।।
अभिभावक वे मूढ़ हैं, संतति आज्ञाहीन।
आग लगाते देश में,हँस-हँस हाथ कराल।।
भ्रमित हुई पीढ़ी नई, व्यभिचारी मतिहीन।
नहीं नियंत्रण लेश भी,चलते चाल कुचाल।।
परिणीता पति से नहीं,करती तृण भर प्रेम।
जारों में ही मन रमा, चुमा रही निज गाल।।
'शुभम्' विषम दारुण दशा,विषज हुआ परिवेश।
पति को नहीं परोसती, पत्नी भोजन थाल।।
शुभमस्तु,
10.08.2026◆ 7.30 आ०मा०
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