शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

उफन रहीं सावन में नदियाँ [ गीतिका ]

 254/2026




©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


उफन  रहीं   सावन   में   नदियाँ।

नदी बनी   गाँवों  की    गलियाँ।।


हाथ-हाथ    चलभाष   अनोखा,

लिखते नहीं पिया अब चिठियाँ।


बरस  रहा    अम्बर    से   पानी,

बान सुनिर्मित तनतीं    खटियाँ।


जब  से    हुए   पिया   परदेशी,

विदा हुईं   पत्नी  की   खुशियाँ।


प्रीतम  बिना सेज नित   डसती,

नहीं प्यार की चलतीं    बतियाँ।


सहनशीलता    धैर्य    नहीं    है,

बात-बात  में  लड़तीं   सखियाँ।


'शुभम्'    मियाँ     मिट्ठू   बहुतेरे,

गिरा  रहे   औरों   की   छवियाँ।


शुभमस्तु,


03.08.2026 ◆4.45 आ०मा०

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