शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

पावस पुण्य प्रसादिका [ दोहा ]

 255/2026


    

[पावस,बरसात,फुहार,रिमझिम,पानी]


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


              सब में एक

पावस पुण्य प्रसादिका,पावन प्रबल प्रताप।

हरियाली  आच्छादिका,  हरे धरा के ताप।।

पावस में प्रीतम बिना, विरहिन धरे न धीर।

सेज डसे नागिन बनी,तान खड़ी शमशीर।।


जेठ और आषाढ़ का,सहा न जाए ताप।

हो जाए बरसात जो,करें इंद्र का जाप।।

नाले-नाली नद-नदी, भरे हुई बरसात।

तपन रही किंचित नहीं,मिली विरह को मात।।


रिमझिम पड़ीं फुहार तो,उफने पोखर-ताल।

बूँद-बूँद सागर भरे,नदियाँ हैं वाचाल।।

नभ से  गिरी  फुहार तो, मिला हृदय को चैन।

पशु पंछी तरु घास को,सुखद हुए दिन-रैन।।


रिमझिम- रिमझिम सावनी, घटा घिरीं चहुँ ओर।

पीहो-पीहो कर रहे, नर्तित वन में मोर।।

सावन-भादों में करें,टर्र -टर्र बहु भेक।

बुला रहे निज प्रेयसी,रिमझिम मेघ अनेक।।


पानी पावस में बहे, नभ से  सर-सर  धार।

सरितायें  मदमत्त-सी, करें सिंधु- अभिसार।।

पानी रहा न आँख में,फिर क्या है कुछ शेष।

जी   लेते    वे जिंदगी, करें अनुगमन मेष।।


             एक में सब

पावस में बरसात की, बरसे  विरल फुहार।

रिमझिम पानी मोहता,मेढक करे गुहार।।


शुभमस्तु,


05.08.2026◆9.00 आ०मा०

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