255/2026
[पावस,बरसात,फुहार,रिमझिम,पानी]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
पावस पुण्य प्रसादिका,पावन प्रबल प्रताप।
हरियाली आच्छादिका, हरे धरा के ताप।।
पावस में प्रीतम बिना, विरहिन धरे न धीर।
सेज डसे नागिन बनी,तान खड़ी शमशीर।।
जेठ और आषाढ़ का,सहा न जाए ताप।
हो जाए बरसात जो,करें इंद्र का जाप।।
नाले-नाली नद-नदी, भरे हुई बरसात।
तपन रही किंचित नहीं,मिली विरह को मात।।
रिमझिम पड़ीं फुहार तो,उफने पोखर-ताल।
बूँद-बूँद सागर भरे,नदियाँ हैं वाचाल।।
नभ से गिरी फुहार तो, मिला हृदय को चैन।
पशु पंछी तरु घास को,सुखद हुए दिन-रैन।।
रिमझिम- रिमझिम सावनी, घटा घिरीं चहुँ ओर।
पीहो-पीहो कर रहे, नर्तित वन में मोर।।
सावन-भादों में करें,टर्र -टर्र बहु भेक।
बुला रहे निज प्रेयसी,रिमझिम मेघ अनेक।।
पानी पावस में बहे, नभ से सर-सर धार।
सरितायें मदमत्त-सी, करें सिंधु- अभिसार।।
पानी रहा न आँख में,फिर क्या है कुछ शेष।
जी लेते वे जिंदगी, करें अनुगमन मेष।।
एक में सब
पावस में बरसात की, बरसे विरल फुहार।
रिमझिम पानी मोहता,मेढक करे गुहार।।
शुभमस्तु,
05.08.2026◆9.00 आ०मा०
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