बुधवार, 4 नवंबर 2020

आदमी,आदमी से जला जा रहा [ गीत ]

 

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✍️ शब्दकार©

🔱 डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम'

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आदमी, आदमी  से  जला  जा   रहा।

नेह  का  भानु छिपता चला जा   रहा।।


ज्योति पर्वों की पहली-सी जलती नहीं।

हर्ष की  वह  लहर भी मच लती नहीं।।

एक  से   एक  इंसाँ   छला  जा   रहा।

आदमी ,  आदमी   से  जला जा   रहा।।


आस्तीन    में     साँप     पलने   लगे।

दोमुँहे    भी   घरों    में  निक लने  लगे।।

कारवाँ  नाग - वंशों  का चला आ  रहा।

आदमी,   आदमी  से  जला जा   रहा।।


हर     मुखौटे       लगाए    हुए  आदमी।

हर   मुखौटा     हटाना   हुआ  लाज़मी।।

कैसे   कह दें   ये   इंसाँ  भला जा   रहा।

आदमी  , आदमी   से   जला जा   रहा।।


नीर      पीता     है   छाना   जाना    हुआ।

पीता   लोहू     सदा  अन  छाना   हुआ।।

हाथ  से  हाथ   अपना   मला  जा    रहा।

आदमी, आदमी     से    जला जा   रहा।।


दूध   से  मन  किसी  का धुला तो    नहीं।

मात्र  थोथे  चने की ढपलियाँ बज  रहीं।।

पाहनों   पर  चँवर  अब  झला जा  रहा।

आदमी, आदमी    से    छला  जा  रहा।।


काम  इतना  कि  फोटो खबर छप  सके।

माला  नेता की  जनता अधर जप  सके।।

अपराधों  का  ध्वज   ही  तना जा   रहा ।

आदमी,  आदमी    से    जला  जा  रहा।।


दागदारों    से    संसद -  भवन  सोहते ।

कामिनी  को   मधुर   लोभ  से    मोहते।।

शुभ  मुहूरत 'शुभम'  अब टला  जा रहा।

आदमी ,आदमी   से  जला जा   रहा।।


💐 शुभमस्तु !


04.11.2020◆4.30 अपराह्न।

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