गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

किटकंनों की सड़क [ नवगीत ]

 074/2026


            


©शब्दकार

डॉ. भगवत स्वरूप 'शुभम्'


किटकन्ने की

सड़क कच्ची

है मुझे अपनी बनानी।


इधर भी

खिड़की खुली है

उधर दरवाजा खुला

कह रहा तू

आज क्यों फिर

पाँव इतना ही झुला

बन के

ठेकेदार  तुझको

बात ही  अपनी चलानी।


आंचलिकता

रूपकों का

है जखीरा पास मेरे

बन खुदा मेरा

न बंदे

जानता  दुर्भाव  तेरे

एक तू

सूरज नहीं है

धूप की तेरी कहानी।


हंकार की

फुंकार तेरी

सुन रहे हैं कान मेरे

ऑंख भी हैं

बंद तेरी

धी गई है तमस घेरे

गोल चक्कर में

भुलाया

उठ रही ऊपर जवानी।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 1.30 प०मा०

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