073/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
नवगीतों की
ठेकेदारी
हथियाए हैं।
नहीं चाहते
लिखे नए
नवगीत और कवि
ठेका ठोके
वही चाहते
कवि नभ के रवि
उन्हें न लिखने
के ढंग किसी
अन्य के भाए हैं!
शायद घुट्टी में
पीकर
वे माँ की आए
नहीं शिष्य जो
कभी अन्य के
वे कहलाए
नव कवियों के
भाग्य
इन्होंने खाए हैं।
बस
कमियों की बात
उन्हें आती है कहना
लिखे पुराने को
पढ़
कर किटकन्ना
अपनी ही
मस्ती में
ठेके पर इतराए।
शुभमस्तु,
05.02.2026◆1.00 प०मा०
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