072/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
तर्जनी-स्पर्श से
कविता
डिजीटल हो गई,
पर्दा मोबाइल का
उजेरा कह रहा।
अगर चाहें तो
उतारें छाप लें
एक पुस्तक में
नया अवतार लें
आज सम्भव है सभी
देखा गया।
किस रूप में थे
भाव
अंतर में छिपे
अब डिजीटल
मंच पर
आकर रुके
ऑंख छूती मात्र
यह अनुभव नया।
अंतरण धन का
हुआ डिजिटल सभी
जो कभी
अभिलेख्य था
पकड़े जमीं
विज्ञान की
चमकार का
खेला नया।
विज्ञान ने
रुकना नहीं
सीखा कभी
कभी धीरे
कभी सत्वर
चाल बढ़ती ही गई
बद और अच्छा
जो भी हुआ
झेला गया।
शुभमस्तु ,
05.02.202◆12.30प०मा०
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