069/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
मत रूठो प्रिय भामिनी,फुला लिए क्यों गाल।
करता हूँ मनुहार मैं, करके एक सवाल।।
नहीं कभी मैं रूठती,मिले आपका प्यार।
सदा आपको चाहती, करो नहीं मनुहार।।
रूठेगा केवल वही, जिसका कोई मीत।
लगती प्रिय मनुहार तब, हार नहीं है जीत।।
तुम रूठो मनुहार से, तुम्हें मनाऊँ कन्त।
इसी तरह खिलता रहे, जीवन विमल वसंत।।
होता है मनुहार में, हम दोनों का प्यार।
कभी- कभी मनभावता, ऐसा नेह दुलार।।
कभी हमारा गैर से, प्रेम न लेश लगाव।
वहाँ नहीं मनुहार भी, नहीं क्रोध का ताव।।
पत्नी हो या प्रेयसी, प्रिय लगती मनुहार।
सदा मनाने में लगे , अपना नेह उदार।।
संतति अपनी रूठती, सभी मनाते लोग।
लालच दे मनुहार से, करें हर्ष का योग।।
धन ऋण से जीवन बना,चलें उतार चढ़ाव।
कभी हुई मनुहार भी, कभी उपेक्षा- ताव।
जीवन की घुड़दौड़ में, सदा अपेक्षित तेल।
मस्त रहें मनुहार में, कर रूठे से मेल।।
भेद मिटाती नेह में , आ जाए यदि गाँठ।
अमृत- सी मनुहार से, नष्ट करे उर नाँठ।।
शुभमस्तु,
05.02.2026◆ 10.15 आ०मा०
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