गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

मनुहार [ सोरठा ]

 070/2026


  


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'



फुला लिए क्यों गाल,मत रूठो प्रिय भामिनी।

करके   एक   सवाल, करता हूँ मनुहार     मैं।।

मिले आपका प्यार,   नहीं   कभी   मैं रूठती।

 करो   नहीं   मनुहार  ,सदा आपको चाहती।।


जिसका  कोई     मीत,    रूठेगा   केवल वही।

हार नहीं   है   जीत,लगती   प्रिय मनुहार तब।।

 तुम्हें     मनाऊँ      कन्त,तुम   रूठो मनुहार से।

 जीवन विमल वसंत,इसी   तरह  मिलता   रहे।।


 हम      दोनों  का   प्यार,होता   है मनुहार में।

 ऐसा  नेह   दुलार,   कभी - कभी मनभावता।।

प्रेम   न    लेश   लगाव,  कभी  हमारा गैर   से।

नहीं   क्रोध  का   ताव,  वहाँ नहीं मनुहार भी।।


प्रिय     लगती  मनुहार,   पत्नी    हो या प्रेयसी।

अपना    नेह     उदार,  सदा  मनाने   में लगे।।

सभी   मनाते     लोग,  संतति   अपनी रूठती।

करें हर्ष   का   योग,  लालच   दे मनुहार  से।।


चलें   उतार-चढ़ाव,धन ऋण से जीवन बना।

कभी   उपेक्षा -ताव, कभी  हुई मनुहार   भी।।

सदा   अपेक्षित   तेल,जीवन  की घुड़दौड़   में।

कर   रूठे से   मेल,   मस्त   रहें   मनुहार   में।।


आ   जाए  यदि गाँठ,   भेद   मिटाती नेह में।

नष्ट   करे   उर   नाँठ,   अमृत-सी मनुहार से।।


शुभमस्तु,


05.02.2026◆ 9.30आ०मा०

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