रविवार, 4 अक्टूबर 2026

उठाया न गया [ गीतिका ]

 329/2026


          


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


हाथ  से  साबुन  सरका , उठाया  न गया।

आईना   गिरा   दरका,  उठाया   न   गया।।


चढ़   ही  गई   है    चर्बी,   देह   पर इतनी,

कमर का  घेर न  उझका, उठाया  न  गया।


गिरा  है आसमां  से  जो, अटका   खजूर में,

दिया  है  वक्त  ने झटका,  उठाया  न गया।


रीत  जाता   है   घड़ा,  साँस    पूरी  करके,

छेद  से नीर   ज्यों  ढरका, उठाया  न गया।


झाग  आँखों  में  गया,  रुदन  करतीं  दोनों,

दर्द  ऐसा  फँसा  अटका, उठाया  न गया।


घाव    होते      तो ,  वक्त    उनको  भरता,

वक्त ने वहाँ   ला   पटका, उठाया  न गया।


जाते-जाते   भी  'शुभम्',   नहाकर  निकले,

रूह निकला बदन  पिचका, उठाया  न गया।


शुभमस्तु,


04.10.2026 12.15 प०मा०

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