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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
डर की बात नहीं
पत्नी से
फिर भी पति रहता है मौन।
नहीं चाहता
गेह-कलह हो
आपस में जूतम -पैजार
धीरे से
निज बोल खोलता
मान रहा पत्नी से हार
छत है एक
चार दीवारें
नहीं शोर से गूँजे भौन।
प्रतिद्वंद्वी वे नहीं
परस्पर
बर्तन वहीं खटकते हैं
अगर रसोई में
हों बर्तन
जब तब वही खनकते हैं
उत्तम शांति रहे
घर भर में
पति जा बैठा अपने लॉन।
यही समझदारी
दोनों की
झगड़े की क्यों आए नौबत
एक अगर
झगड़ालू हो तो
घर बाहर क्यों फैले शोहरत
भला इसी में
चुप्पी साधे
सिर फूटें तो रक्षक कौन।
सभी मुहल्ले के
नर-नारी
हँस-हँस देखें खूब तमाशा
नहीं बीच में
आता कोई
पति-पत्नी को मिले हताशा
अवसर क्योंकर
दें हम उनको
भले चबाएँ नीम दतौन।
शुभमस्तु,
03.11.202612.45 प०मा०
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