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[दया,दान,सत्कर्म,मानव,धर्म]
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
सब में एक
जीवन प्रभु की देन है, दया मानवी धर्म।
पापाचारी के लिए, बुरा न कोई कर्म।।
कष्ट उन्हें मत दीजिए,जीव-जंतु असहाय।
दया भाव के पात्र वे, सबसे श्रेष्ठ उपाय।।
करे दान असहाय को,उसका ऊपर हाथ।
ग्राहक का रहता सदा,नत सिर नीचे हाथ।।
दानी अपने दान की, करें न महिमा गान।
वे नर हैं ओछे सभी, करें याचना मान।।
अपनी पीठ न ठोंकिये, कर जग में सत्कर्म।
सत्कर्मी सब धन्य हैं, निभा रहे जो धर्म।।
ज्योति सदा सत्कर्म की,फैले सब संसार।
मानव का यह धर्म है, करना नित उपकार।।
पाकर मानव- देह को, करे पाशविक कर्म।
पशु ही वह साक्षात है,पाषाणी है मर्म।।
खेल बड़ा प्रारब्ध का, पाकर मानव गात।
कर्म करे अनुरूप ही , करे नहीं उत्पात।।
पल-पल जिएं सँभाल कर,डिगे न क्षण को धर्म।
करनी करना पुण्य की, रखें मोम-सा मर्म।।
धर्म धुरंधर का लिए, कर में झंडा एक।
नेतागण उछले फिरें, जिनमें नहीं विवेक।।
एक में सब
दया दान सत्कर्म से,मानव बने महान।
यही धर्म का मूल है, करें नहीं अभिमान।।
शुभमस्तु,
04.11.2026◆6.30 आ०मा०
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