391/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
-1-
धन है मनुज शरीर, रहे यदि सदा निरोगी।
करे सदा शुभ काज, करें ज्यों कर्मठ योगी।।
रखिए सदा सँवार, बनाए वर्षों रखना।
जीवन का हर स्वाद, मनुज को मीठा चखना।।
-2-
शुभ धन तेरस आज, खरीदें सोना-चाँदी।
धन्वंतरि भगवान, पूजते दादा -दादी।।
रौनक देख अपार, हर्ष मन में अति आया।
भरे कहीं भंडार, कहीं बस धन की छाया।।
-3-
करें नहीं सत्कर्म, चाहते धन मिल जाए।
रखे हाथ पर हाथ, विराजे वे ललचाए।।
कैसे हो मन साध, पूर्ण तेरी रे मानव।
करे नीच ही काम,रहा है निशिदिन दानव।।
-4-
धन धन धन का मंत्र,नहीं देता धन भारी।
कर्मठ बनें सुजान, नहीं तेरी लाचारी।।
होंगे कर्म महान, नहीं अभाव हो धन का।
बनी रहेगी शान, धनिक बन मानव मन का।।
-5-
नहीं पूछता बात, बिना धन कोई तेरी।
मिले न जग में मान, पड़े भी विपद घनेरी।।
पूजनीय वे लोग, जगत में सब धन वाले।
करें कर्म वे श्रेष्ठ, सदा ही रहें निराले।।
शुभमस्तु,
04.11.2026◆8.00 आ०मा०
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