392/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
तम - प्रकाश अनिवार्य हैं,ज्यों नभ में शशि भानु।
पकता है आहार तब, जब हो प्रबल कृशानु।।
ज्ञान बिना मानव नहीं, दिन में भानु प्रकाश।
गिरिवर में सर्वोच्च है, व्यापक गिरि कैलाश।।
दीप पर्व दीपावली, है प्रकाश चहुँ ओर।
खिली अमा में चाँदनी, चमके नभ के छोर।।
आओ ज्ञान प्रकाश का, हम फैलाएं आज।
अज्ञ तमस का नाश हो,सजे ज्ञान का साज।।
तेरा नाम प्रकाश है, करता जगत उजास।
तमस नहीं रहता कहीं, करे न कौशिक रास।।
प्राची में अरुणिम छटा, है प्रकाश के छंद।
बिखरी काव्य कुमोदिनी,तमस हुआ है बंद।।
घर-घर भव्य प्रकाश है,नभ में तारे-चाँद।
तमस मिटाते रात का, निशि अंबर में फाँद।।
तमस बिना रजनी नहीं,रहता नहीं उजास।
सित प्रकाश अस्तित्व से,दिन का खिलता हास।।
मुक्ता सम तव दाँत हैं, अधरों में नव हास।
है प्रकाश छवि मोहिनी, शेष न लेश उदास।।
रूप छटा को देखकर, प्रमुदित आनन रंग।
बिखरी ज्योति प्रकाश की,दर्शक होते दंग।।
'शुभम्' चलें उस ओर हम,जहाँ न तम की बाड़।
नव प्रकाश की दिव्यता,सदा बनाए चाड़।।
शुभमस्तु,
04.11.2026◆10.00प०मा०
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