शनिवार, 12 सितंबर 2026

देह रोग से ग्रस्त है [ दोहा गीतिका ]

 282/2026

         

         



©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह   रोग   से   ग्रस्त है,बिगड़   गया  है हाल।

लिखना-पढ़ना रुक गया,औषधियाँ हैं ढाल।।


पत्नी   सेवा   में   लगी,व्यस्त रहे दिन -रात,

दूध   कभी   फल  दे रही,बदल रही है चाल।


बुरे   समय   में साथ  हो, अपना   कोई एक,

मन में   तब   धीरज रहे,चमकें अँखियाँ गाल।


पत्नी   ही   देवी   करे,दिन    भर   सेवा खूब,

रुग्ण  देह  ऐसी   हुई,समय  बड़ा विकराल।


प्रभु जी    का   वरदान   ये,पत्नी   मेरी नेक,

उसके ही कारण जले,जीवन-ज्योति मशाल।


जीवन  में   सौभाग्य   है,  रमा   रूप   सन्नारि,

तितली-सी नर्तन करे,  लगती  कभी मृणाल।


'शुभम्' सुलभ होतीं नहीं,पत्नी    सबको श्रेष्ठ,

बड़भागी   वे लोग हैं,जिन   पर   राम कृपाल।

शुभमस्तु,


07.09.2026◆5.30 आ०मा०

                    ◆●◆

लिखना -पढ़ना रुक गया [ सजल ]

 281/2026

         


समांत          : आल

पदांत           : अपदांत

मात्राभार      : 24.

मात्रा पतन    :शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


देह   रोग   से   ग्रस्त है,बिगड़   गया  है हाल।

लिखना-पढ़ना रुक गया,औषधियाँ हैं ढाल।।


पत्नी   सेवा   में   लगी,व्यस्त रहे दिन -रात।

दूध   कभी   फल  दे रही,बदल रही है चाल।।


बुरे   समय   में साथ  हो, अपना   कोई एक।

मन में   तब   धीरज रहे,चमकें अँखियाँ गाल।।


पत्नी   ही   देवी   करे,दिन    भर   सेवा खूब।

रुग्ण  देह  ऐसी   हुई,समय  बड़ा विकराल।।


प्रभु जी    का   वरदान   ये,पत्नी   मेरी नेक।

उसके ही कारण जले,जीवन-ज्योति मशाल।।


जीवन  में   सौभाग्य   है,  रमा   रूप   सन्नारि।

तितली-सी नर्तन करे,  लगती  कभी मृणाल।।


'शुभम्' सुलभ होतीं नहीं,पत्नी    सबको श्रेष्ठ।

बड़भागी   वे लोग हैं,जिन   पर   राम कृपाल।।

शुभमस्तु,


07.09.2026◆5.30 आ०मा०

                    ◆●◆

'यतो धर्मस्ततो जय:' [ अतुकांतिका ]

 280/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


'यतो धर्मस्ततो जय:'

संदेश देने वाले

देवकी नंदन

लीलावतारी

कृष्णमुरारी

कान्हा का

अवतरण दिवस आया,

दिशा -दिशा में

जड़ -चेतन में

आनंद छाया।


जन्मते नहीं भगवान

किसी माँ की कोख से

वे प्रकट होते हैं

और अपनी लीलाओं से

जन- जन का

 मन मोह लेते हैं।


अज्ञानी हैं वे लोग 

जो भगवान को

जाति के बंधन में ग्रसते हैं,

ऐसे ही मूढ़ जनों पर

कान्हा आज हँसते हैं,

वे परम आत्मा हैं

परमात्मा हैं,

अहीर या ठाकुर नहीं,

मूढ़ों के मगज में

रूढ़ियों की नालियाँ बही।


आदमी पक्षपाती है

स्वार्थी है,

उत्पाती है

सदा घाती है,

मत करना उससे

न्याय की आशा,

सत्य को ढूंढना 

होगी बहुत बड़ी दुराशा।


आईए आज

उन महान संदेशदाता

 श्रीकृष्ण की

अवतरणी मनाएँ,

उनके संदेश को अंगीकृत कर

भटके हुए मन -मष्तिष्क को

सु दिशा प्रदान कराएँ।


शुभमस्तु,


04.09.2026◆5.00आ०मा०

                   ◆●◆

सोमवार, 31 अगस्त 2026

बदल रहा है देश [ छंद: अहीर ]

 279/2026


         


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


बदल       रहा       है    देश।

बढ़ता       नित        विद्वेष।।

पनप     रहे        हैं     साँप।

लिया  जनों     को     चाँप।।


आस्तीन           के        नाग।

लगा     रहे         हैं     आग।।

जनता         सब        बेहाल।

खड़ा    शीश     पर    काल।।


नेताओं          को           वोट।

सदा          चाहिए         ओट।।

झोंक     देश     को      भाड़।

बने      पेड़          वे     ताड़।।


फूट        डालकर        राज।

शीश        सजाते       ताज।।

अगड़ा        पिछड़ा      भेद।

बढ़ा       रहे        वे     छेद।।


थैली          सबकी       एक।

दलदल    में      सब     नेक।।

मत        करना       विश्वास।

नेतागण          से      आश।।


एक      सभी      की     चाह।

अलग     भले     हों      राह।।

कुर्सी          पर        आसीन।

कभी  न     हों      वे     दीन।।


'शुभम्'     वोट     की     चोट।

करते             लूट - खसोट।।

कैसे        मिले         उजास।

अँधियारे       जब      पास।।


शुभमस्तु,


31.08.2026◆10.30आ०मा०

                    ◆●◆

डर [ चौपाई ]

 278/2026


             


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


डर-डर कर  डर  में  क्या  जीना!

हरित हलाहल हँस-हँस   पीना।।

बिना  डरे   जो  जग   में   जीता।

विदा न   होता  जग   से   रीता।।


डर   से   तव   विवेक मर जाता।

विधिवत  काम  नहीं कर पाता।।

शंकाग्रस्त   अभय    खो    देता।

गलत  पंथ वह    अपना   लेता।।


डर है   निज   मन  की  दुर्बलता।

पछताए  अपने   कर    मलता।।

डर  से   काम    बिगड़ते    सारे।

दिन में    भी    दिख जाते  तारे।।


संतति  को  जो    मातु   डराती।

उसका  पथ  अवरुद्ध   कराती।।

सिंह   शावकों    से   जो   खेला।

वही भरत   था   नाम   अकेला।।


निर्भय  राम     गए  वन    माँही।

नहीं  उन्हें थी डर     की  छांही।।

हनुमत जी  का  मिला    सहारा।

निडर   हुआ  वानर  दल  सारा।।


नहीं  पाक    से   हमको   डरना।

सावधान  स्वच्छन्द     विचरना।।

डरने   से     दुर्बल    हम    होते।

मुख   ढँक   आस्तीन   से  रोते।।


'शुभम्'  निडर रह  जीना   सीखें।

विपदाएँ  फिर एक    न   दीखें।।

ऐसा        भारतवर्ष       बनाएँ।

मन से    हर डर    दूर    भगाएँ।।


शुभमस्तु,


31.08.2026◆5.30 आ०मा०

                   ◆●◆

छिद्र ढूँढ़ता ही रहा [दोहा गीतिका ]

 277/2026


               

©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र    ढूँढ़ता   ही   रहा, सबके   सदा समाज।

ग्रीवा   में   निज   झाँकने,में   लगती है लाज।।


औरों     पर   ही     थोपना, आता गलती खूब,

मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।


भूल     गए   कर्तव्य   को,  माँग   रहे अधिकार,

दुर्बल   करते   देश     को,  डूबे     भले जहाज।


पिता-पुत्र    गर्दभ   कथा,  किसे   नहीं   मालूम,

अनुचित-उचित  न  जानते,छिपा  सीख का राज।


मानव   मानव  का   बना, सबसे   प्रिय आहार,

शेष नहीं  भय  शेर  से,जन  ही जन पर गाज।


चूस   रहे   नेता     बड़े,   जनता   है भयभीत,

राजनीति   मैली   हुई,  झपट   रहे    हैं बाज।


'शुभम्'    रक्त  में  भ्रष्टता,  भरी  भयानक   क्रूर,

बेशर्मी    खिल-खिल   करे,दिखलाती   है नाज।


शुभमस्तु,


30.08.2026◆11.45 प०मा०

                 ◆●◆

मानव वह किस काम का [सजल]

 276/2026


       

समांत          : आज

पदांत           :अपदांत

मात्राभार       : 24.

मात्रा पतन     : शून्य।


©शब्दकार

डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'


छिद्र    ढूँढ़ता   ही   रहा, सबके   सदा समाज।

ग्रीवा   में   निज   झाँकने,में   लगती है लाज।।


औरों     पर   ही     थोपना, आता गलती खूब।

मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।।


भूल     गए   कर्तव्य   को,  माँग   रहे अधिकार।

दुर्बल   करते   देश     को,  डूबे     भले जहाज।।


पिता-पुत्र    गर्दभ   कथा,  किसे   नहीं   मालूम।

अनुचित-उचित  न  जानते,छिपा  सीख का राज।।


मानव   मानव  का   बना, सबसे   प्रिय आहार।

शेष नहीं  भय  शेर  से,जन  ही जन पर गाज।।


चूस   रहे   नेता     बड़े,   जनता   है भयभीत।

राजनीति   मैली   हुई,  झपट   रहे    हैं बाज।।


'शुभम्'    रक्त  में  भ्रष्टता,  भरी  भयानक   क्रूर।

बेशर्मी    खिल-खिल   करे,दिखलाती   है नाज।।


शुभमस्तु,


30.08.2026◆11.45 प०मा०

                 ◆●◆

किनारे पर खड़ा दरख़्त

मेरे सामने नदी बह रही है, बहते -बहते कुछ कह रही है, कभी कलकल कभी हलचल कभी समतल प्रवाह , कभी सूखी हुई आह, नदी में चल रह...