277/2026
©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
छिद्र ढूँढ़ता ही रहा, सबके सदा समाज।
ग्रीवा में निज झाँकने,में लगती है लाज।।
औरों पर ही थोपना, आता गलती खूब,
मानव वह किस काम का,रखे शीश निज ताज।
भूल गए कर्तव्य को, माँग रहे अधिकार,
दुर्बल करते देश को, डूबे भले जहाज।
पिता-पुत्र गर्दभ कथा, किसे नहीं मालूम,
अनुचित-उचित न जानते,छिपा सीख का राज।
मानव मानव का बना, सबसे प्रिय आहार,
शेष नहीं भय शेर से,जन ही जन पर गाज।
चूस रहे नेता बड़े, जनता है भयभीत,
राजनीति मैली हुई, झपट रहे हैं बाज।
'शुभम्' रक्त में भ्रष्टता, भरी भयानक क्रूर,
बेशर्मी खिल-खिल करे,दिखलाती है नाज।
शुभमस्तु,
30.08.2026◆11.45 प०मा०
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