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©शब्दकार
डॉ.भगवत स्वरूप 'शुभम्'
डर-डर कर डर में क्या जीना!
हरित हलाहल हँस-हँस पीना।।
बिना डरे जो जग में जीता।
विदा न होता जग से रीता।।
डर से तव विवेक मर जाता।
विधिवत काम नहीं कर पाता।।
शंकाग्रस्त अभय खो देता।
गलत पंथ वह अपना लेता।।
डर है निज मन की दुर्बलता।
पछताए अपने कर मलता।।
डर से काम बिगड़ते सारे।
दिन में भी दिख जाते तारे।।
संतति को जो मातु डराती।
उसका पथ अवरुद्ध कराती।।
सिंह शावकों से जो खेला।
वही भरत था नाम अकेला।।
निर्भय राम गए वन माँही।
नहीं उन्हें थी डर की छांही।।
हनुमत जी का मिला सहारा।
निडर हुआ वानर दल सारा।।
नहीं पाक से हमको डरना।
सावधान स्वच्छन्द विचरना।।
डरने से दुर्बल हम होते।
मुख ढँक आस्तीन से रोते।।
'शुभम्' निडर रह जीना सीखें।
विपदाएँ फिर एक न दीखें।।
ऐसा भारतवर्ष बनाएँ।
मन से हर डर दूर भगाएँ।।
शुभमस्तु,
31.08.2026◆5.30 आ०मा०
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